लवंगादि चूर्ण बनाने की विधि, उपयोग एवं फायदे

हेल्थ डेस्क- लवंगादि चूर्ण एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसमें लवंग के अलावे कई जड़ी- बूटियों को मिलाकर तैयार किया जाता है. इसमें मुख्य रूप से लवंग का मात्रा अधिक है इसलिए इसे लवंगादि चूर्ण के नाम से जाना जाता है. लवंगादि चूर्ण बनाने की विधि, उपयोग एवं फायदे.

इस लेख के माध्यम से हम लवंगादि चूर्ण बनाने की विधि, उपयोग करने के तरीके और फायदे के बारे में बताएंगे.

तो चलिए जानते हैं विस्तार से-

लवंगादि चूर्ण बनाने के लिए आपको इन जड़ी- बूटियों की आवश्यकता होगी.

लवंग-20 ग्राम.

सफेद मिर्च-20 ग्राम.

खस-20 ग्राम.

तगर-20 ग्राम.

सफेद चंदन के डोडे-20 ग्राम.

मगज- 20 ग्राम.

सफेद जीरा- 20 ग्राम.

कबाब चीनी- 20 ग्राम.

पुष्कर मूल- 20 ग्राम.

मुलेठी- 20 ग्राम.

सौंफ- 20 ग्राम.

वंशलोचन- 20 ग्राम.

शुद्ध कपूर- 20 ग्राम.

जायफल- 20 ग्राम.

दालचीनी- 20 ग्राम.

नेत्र वाला-20 ग्राम.

पिपरा मूल- 20 ग्राम.

सोठ- 20 ग्राम.

नागकेसर- 20 ग्राम.

छोटी इलायची- 20 ग्राम.

सफेद चंदन- 20 ग्राम.

नीलकमल- 20 ग्राम.

जायफल-20 ग्राम.

जटा मासी-20 ग्राम.

शक्कर- 200 ग्राम.

उपर्युक्त सभी चीजों को अच्छी तरह से धूप में सुखाकर पीसकर पाउडर बनाकर कपड़े छानकर और सुरक्षित रख लें.

लवंगादि चूर्ण बनाने की विधि, उपयोग एवं फायदे

लवंगादि चूर्ण के उपयोग एवं फायदे-

मात्रा- 1 से 3 ग्राम तक शहद या पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करें.

  • इसके सेवन करने से क्षय, कास, वमन, अरुचि, स्वर भंग, श्वास, ह्रदय रोग, अतिसार, संग्रहणी आदि रोगों को दूर करता है. वीर्य वर्धक है.
  • यह चूर्ण खाने के प्रति रुचि उत्पन्न करता है. अग्नि प्रदीपक, बलकारक, पौष्टिक और त्रिदोष नाशक है.
  • छाती की धड़कन, तमक श्वास, गलग्रह खांसी, हिचकी, पीनस, ग्रहणी, अतिसार और प्रमेह को शीघ्र दूर करता है.
  • ज्यादा दिनों तक बुखार आकर छूटने के बाद जो कमजोरी रहती है उसमें किसी तरह का कुपथ्य हो जाने से पुनः हरारत मालूम पड़ने लगती है. इसलिए भूख नहीं लगना, कमजोरी होना, अन्न के प्रति अरुचि, खून की कमी के कारण शरीर का पिला हो जाना, कफ की वृद्धि आदि होने पर उपयोग करना लाभदायक होता है.
  • इसके सेवन से थकान दूर हो जाती है और उपर्युक्त उपद्रव नष्ट हो जाते हैं.
  • कभी-कभी मन्दाग्नि के कारण पाचन शक्ति में खराबी होने से उनका पाक अच्छी तरह से नहीं हो पाता है. तब पेट फूलना, पेट में आवाज होना, दस्त पतला होना, प्यास अधिक लगना, शरीर में जलन होना, वायु विकार आदि उपद्रव हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में लवंगादि चूर्ण का सेवन शीघ्र लाभ देता है.
  • संग्रहणी से पीड़ित रोगी को लवंगादि चूर्ण का सेवन करना फायदेमंद होता है. इसके सेवन करने से मल सही से उतरने लगता है क्योंकि इस रोग से पीड़ित रोगी को बिना दर्द के हल्का और गंदा पानी की तरह दस्त होता है.
  • गोला रोग अर्थात जब पेट में गैस बनने लगे तो इस रोग को दूर करने के लिए लवंगादि चूर्ण का सेवन करना लाभदायक होता है क्योंकि इसके सेवन से खाना अच्छे से पचने लगता है और गैस नही बन पाती है जिससे इस समस्या से राहत मिलता है.
  • लवंगादि चूर्ण का सेवन के पीलिया रोग में भी काफी लाभदायक होता है क्योंकि पीलिया रोग में पाचन तंत्र सही ढंग से नहीं काम कर पाता है जिसके कारण पेट फूलने की समस्या बनी रहती है. ऐसे में इसका सेवन करना काफी फायदेमंद होता है.
  • अतिसार रोग में जब मल बहुत पतला हो जाता है. बार-बार आने के कारण रोगी अंदर कमजोरी होने लगता है ऐसी अवस्था में लवंगादि चूर्ण का सेवन काफी फायदेमंद होता है क्योंकि लवंगादि चूर्ण पेट और शरीर को बल प्रदान करता है.
  • क्षय ( TB ) एक संक्रामक रोग है और कई गंभीर परेशानियों का कारण बनती है. लवंगादि चूर्ण के सेवन से यह रोग दूर होता है.
  • पीनस नाक की एक गंभीर बीमारी है. जिसमें नाक महक को पहचानने में असमर्थ हो जाता है और कई बार नाक से पानी और खून तक निकलने लगता है. इस रोग में लवंगादि चूर्ण का सेवन करने से काफी लाभ होता है.
  • हिचकी आना एक आम समस्या है जो तीखी चीजों के सेवन से हो जाता है और पानी पीने से खुद ही ठीक हो जाता है. लेकिन यदि पानी पीने के बाद भी हिचकी दूर ना हो तो ऐसी स्थिति में लवंगादि चूर्ण का सेवन करना काफी लाभदायक होता है.
  • आप अच्छी तरह से जानते होंगे कि लवंग खांसी- सर्दी में विशेष रूप से लाभदायक होता है और हमारी दादी- नानी इसे अपने सर्दी- जुकाम निवारक के रूप में इस्तेमाल करती आ रही हैं उसी प्रकार लवंग से बने होने के कारण लवंगादि चूर्ण कंठ के सभी रोगों का रामबाण इलाज है.
  • लवंगादि चूर्ण हृदय रोगों के लिए रामबाण औषधि है और इसका नियमित सेवन करने से ह्रदय से जुड़ी समस्याएं दूर होती है.
  • लवंगादि चूर्ण के सेवन से अग्नि प्रदीप्त होती है और भोजन का पाचन भी बहुत ही आसानी से होता है जिसके कारण कब्ज की समस्या नहीं होती है.. जिन्हें कब्ज की समस्या है उन्हें इसका सेवन करना काफी फायदेमंद होता है
  • जिनकी भोजन में रुचि ना लगती हो, उसे इस चूर्ण का सेवन करना चाहिए. इसके सेवन से पाचन सही ढंग से होने लगता है जिससे भूख अच्छी लगती है.
  • श्री शारंगधर संहिता में लिखा है यह राजा को देने योग्य औषधि होता है क्योंकि यह शरीर की पुष्टि करता है और स्त्री भोगने की शक्ति प्रदान करता है. इस प्रकार जिनकी सेक्स क्षमता कमजोर हो गई है उन्हें भी इसका सेवन करना लाभदायक हो सकता है.
  • विशेष- आयुर्वेद दवा दुकानों में लवंगादि वटी भी बनी बनाई मिलती है.लवंगादि वटी बनाने के लिए लौंग का चूर्ण एक भाग, कालीमिर्च का चूर्ण एक भाग, बहेड़ा एक भाग और कत्था 3 भाग को बबूल की छाल की भावना देकर तैयार किया जाता है.इसे बनाने के लिए उपर्युक्त सभी चीजों को लेकर खबल करना है. अब बबूल की छाल के काढ़े की तीन भावना देकर 500 मिलीग्राम की छोटी-छोटी गोलियां बनाकर छाया में सुखाकर कांच की एयरटाइट बोतल में सुरक्षित रख लें.

    इस वटी में से बच्चों को एक-एक गोली चूसने के लिए सुबह, दोपहर, शाम देवें. और बड़ों को 2 से 3 गोली या चिकित्सक के परामर्शानुसार.

    * इसके सेवन से खांसी की समस्या 8 से 12 घंटे में दूर हो जाती है. वशर्ते दवा का निर्माण उचित तरीके से किया गया हो.

    * लवंगादि वटी के सेवन से सर्दी- जुकाम की समस्या दूर होती है यह सर्दी- जुकाम के लिए अत्यंत गुणकारी औषधि है.

    * लवंगादि वटी चूसने से खरास में भी जल्द लाभ होता है.

    * गले में जमा हुआ कफ बाहर निकालने में मदद करता है.

    * मुंह के छालों को भी दूर करने में यह बहुत ही गुणकारी औषधि है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह एक बार जरूर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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