गठिया रोग संधिशोथ क्या है ? जाने कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय

हेल्थ डेस्क- गठिया रोग संधिशोथ एक कठिन रोग है, जिसके कारण पीड़ा, सूजन तथा थकान हो सकती है. यह आपके संपूर्ण जीवन को भी प्रभावित कर सकती है. यह आपके परिवा,र रोजमर्रा के कार्य, मनोरंजक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है. यह आपके जीवन को छोटा भी कर सकती है. लोगों को गठिया रोग संधिशोथ से डर लगता है. और इसके कारण होने वाली अपंगता तथा लंगड़ेपन से भी भयभीत होते हैं. भाग्यवश अधिकांश महिलाओं मे गठिया रोग संधिशोथ को नियंत्रित किया जा सकता है और आप पर एवं आपके भविष्य पर इसके प्रभाव को सीमित किया जा सकता है.

आज के इस आर्टिकल में हम आपके जोड़ों के विषय में, अर्थराइटिस के विषय में सामान्य रूप से तथा गठिया रोग संधिशोथ के विषय में जानकारी देंगे.

जोड़-

एक जेली- फिश तथा आपके बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है आपका कंकाल- आपकी हड्डियां तथा जोड़ ! हड्डियां आपके शरीर को इसकी संरचना प्रदान करती है तथा जोड़ आपकी हड्डियों को आपस में जोड़ते हैं तथा आपके शरीर को गति करने में मदद करते हैं. जोड़ों के बिना आपका शरीर मूर्ति के समान होगा यानी आपका शरीर मुड़ नहीं सकता है.

जोड़ का  निर्माण 2 हड्डियों के सिरों से होता है जो कार्टिलेज नामक तत्व से ढका होता है तथा यह एक नली जैसी कैप्सूल के भीतर होता है. अधिकांश जोड़ों के कैप्सूल में एक ऊपरी परत होती है जिसे श्लेषक झिल्ली (Synovial membrane ) कहा है. जाता है जिसकी दो प्रमुख प्रक्रियाएं होती है.

श्लेषक झिल्लियों को बनाने वाली कोशिकाएं ऐसे तत्वों को छोड़ती है जो जोड़ों में चिकनापन लाती है तथा वे नियमित कटने- छिलने से होने वाले कचरे को भी  हटाती है.

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अर्थराइटिस क्या होता है?

अर्थराइटिस का मतलब होता है जोड़ में प्रदाह- प्रदाह पीड़ाप्रद होती है तथा यह अतिसामान्य चिकित्सकीय समस्या है. अर्थराइटिस आर्थेल्जिया से भिन्न होती है जिसका तात्पर्य उस दर्द या पीड़ा से होता है जो हम सो कर उठने पर या व्यायाम के बाद महसूस करते हैं. यदि दर्द या पीड़ा गर्मी की हल्की बारिश के समान है. तो अर्थराइटिस एक आंधी के समान है तथा गठिया रोग संधिशोथ एक तूफान की तरह है.

हड्डी, कार्टिलेज तथा श्लेषक झिल्ली- जोड़ के भिन्न भागों में समस्या के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के अर्थराइटिस होते हैं. ठीक वैसे ही जैसे आपकी कार कई कारणों से खराब हो सकती है. हड्डी के क्षतिग्रस्त होने के फलस्वरूप कार्टिलेज असामान्य रूप से नष्ट, क्षतिग्रस्त हो जाता है और प्रदाह होती है. कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने पर ओस्टियोआर्थराइटिस की शिकायत होती है. गठिया रोग संधि शोथ श्लेषक झिल्लियों या जोड़ों की परत की प्रदाह के परिणाम स्वरूप होता है.

अर्थराइटिस के 100 से अधिक कारण ज्ञात है. जैसे- रुमेटाइड अर्थराइटिस, ओस्टियोआर्थराइटिस, गठिया, सूडो- गाउट तथा ल्युपस सामान्य है जबकि अन्य दुर्लभ होते हैं. जनसंख्या तथा लिंग के अनुसार अर्थराइटिस के विभिन्न प्रकारों का होना निर्भर करता है.

उदाहरण के लिए ओस्टियोआर्थराइटिस वृद्धों में अधिक सामान्य होता है. रुमेटाइड अर्थराइटिस तथा ल्युपस महिलाओं में अधिक सामान्य है. गठिया पुरुषों में अधिक सामान्य है. एंकिलुजिंग स्पोंडिलाइटिस कुछ भारतीय जातियों में अधिक सामान्य है. अर्थराइटिस किस व्यक्ति के भीतर विकसित होता है उसे सुनिश्चित करने में जींस, हार्मोन तथा उम्र सभी भूमिका निभाते हैं.

गठिया रोग संधिशोथ किस उम्र में होता है ?

गठिया रोग संधि शोथ सबसे अधिक सामान्य तथा गंभीर प्रकार की अर्थराइटिस में से एक है. गठिया रोग संधि शोथ सभी उम्र तथा सभी जातियों को प्रभावित करती है. कुल मिलाकर यह लगभग 1% जनसंख्या को प्रभावित करती है. किंतु पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में यह अधिक होती है.

गठिया रोग संधि शोथ बच्चों तथा किशोरों में भी हो सकता है. लेकिन सामान्यता है इसका प्रारंभ 25 से 60 वर्ष की आयु के बीच होता है. हालाँकि 80- 90 वर्ष की आयु में भी शुरू हो सकता है.

पहले की अपेक्षा आजकल गठिया रोग संधि शोथ होना ज्यादा सामान्य लगने लगी है इसलिए इसे आधुनिक रोग भी कहा गया है. हालांकि कभी-कभी सैकड़ों वर्ष पुरानी कंकाल अवशेष में गठिया रोग संधि शोथ पाया जाता है. प्रत्यक्ष गठिया रोग संधि शोथ दूसरों की अपेक्षा कुछ प्राचीन समुदायों में अधिक पाया गया है. समझा जाता है कि यहां गठिया रोग संधि शोथ का कारण किसी प्रकार का संक्रमण रहा होगा.

गठिया रोग संधि शोथ का कारण अज्ञात है लेकिन जोड़ों में भीतर होने वाली प्रदाह संयोजक उत्तकों को हमेशा के लिए क्षति पहुंचा सकता है या नष्ट भी कर सकता है. गठिया रोग संधिशोथ से होने वाली क्षति तथा अपंगता इसके प्रकार पर तथा इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी जल्दी उपचार करवाया गया.

कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि गठिया रोग संधिशोथ का उपचार नहीं हो सकता है तथा इसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है. वास्तव में सच्चाई इसके विपरीत है. अधिकांश लोगों में गठिया रोग संधिशोथ का सफल इलाज किया जा सकता है. विशेषकर जब जल्दी ही उपचार देना शुरू कर दिया जाए.

हालांकि गठिया रोग संधिशोथ के विषय में अभी भी गलतफहमिया है जिसके कारण उपचार में देरी हो सकती है जो खतरनाक हो सकती है तथा कभी-कभी लोग नीम- हकीम का नुकसानदेह उपचार करवा लेते हैं.

गठिया रोग संधिशोथ प्राथमिक रूप से शरीर के श्लेषक जोड़ों को प्रभावित करता है. अधिकांशतः जोड़ शरीर के दोनों भागों में समान रूप से या लगभग बराबर- बराबर प्रभावित होती है. अक्सर शरीर के अधिक प्रभावी भाग में अर्थराइटिस का प्रभाव ज्यादा बुरा होता है.

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गठिया रोग संधिशोथ प्रदाह के लक्षणों से प्रतिलक्षित होता है.

पीड़ा, सूजन, गर्मी तथा कड़ापन शिराओं के सिरों को प्रभावित करने वाली ज्वलनशील कोशिका तथा रसायनों के द्वारा पीड़ा होती है. गठिया रोग संधिशोथ में जोड़ों में अथवा जोड़ों की गति के साथ पीड़ा का अनुभव होता है. श्लेषक झिल्ली के मोटे हो जाने के कारण सूजन होती है और कभी-कभी जोड़ों के भीतर द्रव्य तथा कचरों के बढ़ जाने के कारण भी सूजन होती है. सूजे हुए जोड़ों की ओर रक्त प्रवाह के बढ़ जाने के परिणाम स्वरुप गर्मी और लाली आती है. कुछ देर के आराम के बाद लगभग सभी ज्वलनशील जोड़ों में कड़ापन आ जाता है जिसे सामान्यता सुबह का कड़ापन कहा जाता है.

यह गठिया रोग संधिशोथ में विशेष रुप से सामान्य है. सुबह का कड़ापन कुछ घंटों से लेकर पूरे दिन तक बनी रह सकती है. सामान्य गतिशीलता को पुनः प्राप्त करने के लिए जोड़ों में गर्मी पहुंचा कर या व्यायाम करके ज्वलनशील जोड़ों को ढीला करना चाहिए.

गठिया रोग संधिशोथ के कारण क्या हैं ?

गठिया रोग संधिशोथ का विशिष्ट कारण एक रहस्य ही बना हुआ है. लेकिन कुछ संकेत प्राप्त हैं जिन पर हम अब चर्चा करेंगे.

संक्रमण या आहार-

इन सभी तथ्यों पर अनेक शोध कार्यों द्वारा विचार किया जा चुका है. किंतु, गठिया रोग संधिशोध को सीधे प्रभावित करने वाला कोई भी संक्रमण विषैला रसायन या भोजन सामग्री ज्ञात नहीं की जा सकी है. संभव है कि कुछ रोगियों को पहले संक्रमण या रसायन से तकलीफ आदि हो चुके हैं. किंतु, अधिकांश रोगियों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता है. गठिया रोग संधिशोथ के प्रारंभ होने के पहले कुछ सप्ताह या महीनों में लगभग सभी रोगी कुछ ऐसा कर चुके या अनुभव कर चुके होते हैं. जिसे वे अपने रोग का कारण समझते हैं लेकिन यह तथ्य संजोग मात्र तथा असंबंधित ही प्रतीत होती है.

अनुवांशिक-

हम जीन के द्वारा अपनी सभी विशेषताएं शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक अपने माता-पिता द्वारा प्राप्त करते हैं. कुछ जीन डायबिटीज जैसे रोगों को विकसित करने के लिए आपके भीतर अधिक ग्राह्यता उत्पन्न करते हैं. गठिया रोग संधिशोथ से भी अनुवांशिकीए आधार है जिसमें अधिकांश रोगियों के भीतर HLA-DR4 जीन होते हैं. एक सामान्य रक्त परीक्षण द्वारा जीन को मापा जा सकता है. HLA-DR4 जीन वंशानुगत होता है जिसके कारण गठिया रोग संधि शोथ का पारिवारिक इतिहास अधिक सामान्य हो जाता है. इस जीन के कुछ प्रकार या एलेल ( Alleles ) गठिया रोग संधिशोथ के पूर्वानुमान या संभावित परिणाम बताने में सहायक हो सकते हैं.

हार्मोन-

गठिया रोग संधिशोथ पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है. संभवतः हार्मोन संबंधी अंतर के कारण यह रोचक तथ्य है कि गठिया रोग संधिशोथ अक्सर गर्भावस्था के बाद उत्पन्न होता है अथवा कभी-कभी हार्मोन परिवर्तन के दौरान होता है. यद्यपि हम हार्मोनो, रोग प्रतिरोधक प्रक्रिया तथा गठिया रोग संधिशोथ के विकास के बीच होने वाले सूत्र संबंध को समझने में असमर्थ हैं. लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि ऐसे संबंध का अस्तित्व है.

तनाव-

गठिया रोग संधिशोथ अक्सर तनाव के बाद विकसित होता है. हम यह नहीं जानते कि ऐसा क्यों होता है लेकिन जोड़ों में अचानक सूजन, पीड़ा तथा कड़ापन आ जाता है. यह तो हम सभी जानते हैं कि तनाव रोग प्रतिरोधक प्रक्रिया को प्रभावित करता है तथा काफी प्रभावशाली ढंग से इसमें बदलाव ला सकता है. यहां तक कि इसको क्षतिग्रस्त भी कर सकता है.

हम जिन चीजों को नियंत्रित कर पाते हैं तथा जिनको नहीं दोनों के ही कारण तनाव होता है. तनाव को नियंत्रित करने में हम सभी की क्षमता अलग-अलग होती है. गठिया रोग संधिशोथ जैसी पुरानी बीमारी तनाव को नियंत्रित करना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह अर्थराइटिस को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है. एक सादगी तथा कम तनाव मुक्त जीवन अक्सर गठिया रोग संधिशोथ में सुधार लाता है तथा दवा और चिकित्सा विधियों की आवश्यकता को कम करता है.

वातावरण-

कुछ विशेष वातावरण गठिया रोग संधिशोथ को बढ़ा देता है यद्यपि अधिकांश भागों में गठिया रोग संधिशोथ की घटनाएं एक समान होती है. किंतु बदलते रहने वाले मौसम के साथ ठंडी, नम जलवायु पीड़ा को बढ़ा देती है. गठिया रोग संधिशोथ पर प्रदूषण का भी सूक्ष्म असर पड़ता है, अत्यधिक प्रदूषित शहरों से गांव जाने वाले अनेक रोगियों को अर्थराइटिस की तकलीफ में लगभग तुरंत आराम का अनुभव होता है. इसके पीछे घटा हुआ तनाव भी एक कारक होता है.

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गठिया रोग से जोड़ों को नुकसान-

हमें गठिया रोग संधि शोथ का कारण ज्ञात नहीं है लेकिन जोड़ों को क्षति श्लेषक झिल्ली में प्रदाह के द्वारा पहुंचती है. इस पतली श्लेषक झिल्ली में प्रदाह उत्पन्न हो जाती है और इसमें लिंफोसाइट, मेक्रोफेजेस, पॉलीमोर्फस तथा फिब्रोब्लास्टस नामक कोशिकाएं भर जाती है. इस मोटी ज्वलनशील श्लेषक झिल्ली को पैनस (Pannus ) कहते हैं. पैनस के भीतर स्थित कोशिकाएं सक्रिय हो जाती है तथा वे उन एंजाइम एवं रसायनों को छोड़ती है जो दोनों ही कार्टिलेज एवं हड्डी को स्थायी रूप से क्षति पहुंचाते हैं और वह ज्वलनशील उत्तकों में अधिक कोशिकाओं को भी आकर्षित करते हैं. गठिया रोग संधिशोथ में यह ज्वलनशील प्रक्रिया एक तरफा रास्ते की तरह होती है. प्रदाह असीमित रूप से बढ़ती जाती है जिसके कारण अधिक से अधिक क्षति होती रहती है, जिसके कारण संभवतः जोड़ का विघटन और अपंगता भी हो जाती है.

प्रदाह की प्रक्रिया शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली का एक भाग है. रोग प्रतिरोधक प्रणाली बैक्टीरिया, वायरस तथा कैंसर जैसे आक्रामक रोगों से शरीर का प्राकृतिक रूप से बचाव करता है. रोग प्रतिरोधक प्रणाली की कोशिकाएं या तो आक्रामक रूप से संघर्ष करने के लिए प्रतिरक्षियों का निर्माण करके अथवा उन पर प्रत्यक्ष प्रहार करके आक्रामक रोगों को पहचाती तथा उनकी तरफ प्रतिक्रिया करती है.

रोग प्रतिरोधक प्रणाली सामान्यता किसी बाहरी एजेंट के द्वारा सक्रिय होती है किंतु सामान्य कोशिकाओं को प्रभावित करने के लिए भी इसे सक्रिय किया जा सकता है. अज्ञात कारण बश, गठिया रोग संधिशोथ में रोग प्रतिरोधक प्रणाली सक्रिय हो जाती है तथा श्लेषक झिल्ली में अत्यधिक प्रदाह उत्पन्न करती है. गठिया रोग संधिशोथ से संघर्ष करने के लिए प्रयोग की जाने वाली अनेक दवाओं की जीवाणु- रोधी तथा रोग प्रतिरोधक प्रणाली विरोधी गतिविधि होती है.

गठिया रोग प्रारंभ होने की उम्र क्या हो सकती है ?

गठिया रोग संधिशोथ किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन अधिकांशत 20 से 30 वर्ष की आयु के बीच या 30 वर्ष के प्रारंभ में शुरू होता है अथवा बाद में इसकी शुरुआत 50- 60 वर्ष की आयु में होती है. उम्र के यह दोनों ही ग्रुप हार्मोन संबंधी परिवर्तन एवं तीव्र थकान की अवधि के होते हैं इसलिए गठिया रोग संधिशोथ की तीव्रता उम्र- अवधि के प्रारंभ के अनुसार भिन्न- भिन्न होती है. 50 वर्ष की आयु के बाद रोग प्रारंभ होने का अर्थ है हल्का रोग.

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गठिया रोग संधिशोथ का घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार-

1 .500 ग्राम सरसों तेल में 20 ग्राम लहसुन, 10 ग्राम धतूरा के बीज, 10 ग्राम अकवन जड़ की छाल, 10 ग्राम कनैल फूल के जड़ की छाल तथा 10 ग्राम खैनी को जलाकर इसे आच से उतार लें. अब तेल को हल्का ठंडा होने पर 10 ग्राम कपूर डालें और इसे छानकर सुरक्षित रख लें. अब इस तेल की मालिश करने से गठिया रोग संधिशोथ में अच्छा लाभ होता है. इससे हड्डियों, मांस पेशियों, नसों आदि के दर्द पर मालिश करने से अच्छा लाभ होता है.

2 .गठिया या वातरोग में अडूसा के पत्तों को गरम करके सेकने से सूजन और दर्द में अच्छा लाभ होता है.

3 .25 ग्राम सोंठ, 100 ग्राम हरड़ और 15 ग्राम अजमोद, 10 ग्राम सेंधा नमक को पिसकर चूर्ण बना लें. अब इसमें से 3 ग्राम सुबह-शाम गर्म पानी के साथ सेवन करने से गठिया रोग संधिशोथ से राहत मिलता है.

4 .अश्वगंधा चूर्ण 50 ग्राम, सोठ का चूर्ण 25 ग्राम, मिश्री 75 ग्राम को को चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें. अब भोजन करने के बाद एक चम्मच की मात्रा सुबह-शाम सेवन करने से आमवात, विबंध, गठिया रोग तथा पेट के अन्य विकार दूर होते हैं.

5 .गिलोय 50 ग्राम और सोंठ 25 ग्राम को चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें. इसमें से 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से गठिया रोग में अच्छा लाभ होता है.

6 .हींग को सरसों तेल में मिलाकर मालिश करने से दर्द से राहत मिलता है इस तेल की मालिश नसों को ताकत मिलती है जिससे दर्द से आराम मिलता है.

7 .गर्म पानी में 10 ग्राम शहद को मिला लें अब इसमें पांच बूंद कागजी नींबू का रस मिलाकर पीने इससे गठिया रोग में आराम मिलता है. गठिया के रोगी को भरपूर मात्रा में शहद का सेवन करना चाहिए.

8 .सरसों के तेल में सेंधा नमक मिलाकर गठिया वाले दर्द पर मालिश करने से आराम मिलता है.

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गठिया रोग की आयुर्वेदिक औषधि-

महायोगराज गुग्गुल.

लासुनादि बटी.

महारास्नादि क्वाथ.

वात बिध्वंशन रस.

अमृतादि गुग्गुल.

महानारायण तेल की मालिश.

आम वातारी रस.

पुनर्नवादि गुग्गुल.

इत्यादि आयुर्वेदिक औषधियों का चिकित्सक की देखरेख में सही अनुपान से सेवन करने से गठिया रोग संधिशोथ में अच्छा लाभ होता है. नियमित कुछ दिन सेवन करने से रोग से मुक्ति मिल जाती है.

नोट- यह पोस्ट शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है. किसी भी प्रयोग से पहले योग्य डॉक्टर की सलाह जरूर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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