अग्निमांद्य रोग होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

रोग परिचय- अग्निमांद्य, भूख की कमी, मंदाग्नि, अजीर्ण, भोजन का ठीक प्रकार से पाचन का न होना, भूख न लगना तथा सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे बदहजमी भी कहते हैं. इसे हाइपोक्लोरहाइड्रिया के नाम से भी जाना जाता है. अग्निमांद्य रोग होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय.

अग्निमांद्य रोग होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

अग्निमांद्य एक ऐसा शाब्दिक प्रयोग है. जिसमें किए हुए भोजन के पश्चात असामान्य अ.सुविधा उत्पन्न होती है साथ ही छाती की जलन, मिचली तथा आमाशय दर्द आदि के साथ लक्षण उत्पन्न होते हैं. यह पाचक एंजाइम की कमी अथवा आमाशय में अम्ल की उपस्थिति के परिणाम स्वरुप होता है. इसमें खाए हुए पदार्थ भली-भांति नहीं पच सकते, जिससे बार- बार डकारे आती है. सिर में चक्कर, ह्रदय अधिक धड़कना, कब्ज की शिकायत की अधिकता आदि इस रोग के विशेष लक्षण है.

अग्निमांद्य होने के कारण-

इस रोग को उत्पन्न करने वाले कई कारण हैं.

ऑर्गेनिक डिजीज- कंठनली का ट्यूमर, कार्डियो स्पाज्म, डायाफ्रामेटिक हर्निया, गैस्ट्रोइटिस, पेप्टिक अल्सर तथा आमाशय का कैंसर आदि.

रिफ्लेक्स डिस्पेप्सिया- अपेंडिसाइटिस, कोलीसिस्टाइटिस, पेनक्रिएटाइटिस, एमीबिएसिस, स्पास्टिक कोलन, हेल्मेंथीएसिस आदि.

सिस्टेमिक डिजीज- कार्डियक फैलियर, पल्नमोरी ट्यूबरक्लोसिस, एनीमिया, एडीसन का रोग, यूरिमिया, हाइपरपैराथायराइडिज्म आदि.

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क्रियात्मक कारण-

1 .बुरी आदतें जैसे- आवश्यकता से अधिक खाने या रात में देर से खाने, शराब पीने की आदत से प्रायः स्थाई डिस्पेप्सिया का रोग हो जाता है.

2 .शोक, चिंता, क्रोध और अन्य मानसिक संक्षोभ के कारण आमाशय रस की उत्पत्ति कम होती है और इससे भी पाचक शक्ति कम हो जाती है.

3 .शीघ्र भोजन करना, बिना चबाए जल्दी-जल्दी भोजन खाना, भोजन करते समय पढ़ते जाना अथवा भोजन के तुरंत बाद पढ़ने लगना आदि कारणों से भी अजीर्ण का रोग हो जाता है.

4 .अधीक चटपटा व मसालेदार भोजन, सोडा वाटर या लेमनेड पीने अथवा अधिक चाय, कॉफी के सेवन से अम्ल की अधिकता के कारण भी अजीर्ण हो जाती है.

5 .ज्यादा आइसक्रीम या बर्फ के सेवन से उदर कला शोथ होकर अग्निमांद्य का रोग हो जाता है.

6 .अमाशय की मांसपेशियां कमजोर हो जाने से भी स्थाई अग्निमांद्य रोग उत्पन्न हो जाता है.

7 .कभी-कभी आमाशयिक रस सामान्य से भिन्न गुणों का बनता है जिससे अग्निमांद्य का रोग हो जाता है.

8 .तंत्रिका दौर्बल्य से ग्रसित रोगी को अग्निमांद्य की शिकायत रहती है.

9 .अधिक पानी पीने, अधिक शारीरिक या मानसिक परिश्रम अथवा बिल्कुल ही परिश्रम ना करने, खटाई, अचार तथा अन्य खट्टे पदार्थों का अधिक सेवन, अस्वास्थ्य कर मकान में निवास, कमर पर खूब कस कर कपड़े पहनना, व्यायाम के पश्चात कुछ समय विश्राम किए बिना ही तुरंत भोजन कर लेने आदि कारणों से भी अजीर्ण का रोग हो जाता है.

10 .दातों का रोग  विशेषकर पायरिया भी इसका एक प्रमुख कारण है.

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अग्निमांद्य रोग के लक्षण-

इस रोग में निम्नलिखित सामान्य लक्षण होते हैं.

1 .रोगी को भूख नहीं लगती, उसे खट्टी डकार आती है तथा छाती में जलन होती है. रोगी का जी मिचलाया करता है और उसके मुंह में पानी भर आता है.

2 .सिर भारी रहता है. कभी-कभी सिर में चक्कर भी आती है.

3 .भोजन के बाद प्रायः रोगी का पेट फूल जाता है.

4 .दिल धड़कने की भी शिकायत मिलती है.

5 .रोगी को खाने- पीने की इच्छा नहीं होती है. उसे या तो कब्ज रहता है अथवा पतले दस्त आते हैं.

6 .किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता है. वह थोड़ा भी परिश्रम करने से थकान महसूस करने लगते हैं.

7 .जीभ पर मैल जमा रहती है तथा कभी कभी मुंह से दुर्गंध आने लगती है.

8 .अजीर्ण रोग के पुराने होने पर पेट में गैस बनने लगती है. पेट के निचले स्थान पर अर्थात नाभि प्रदेश की हड्डी के नीचे बेचैनी, भारीपन तथा भोजन करने के बाद पेट में गुड़गुडाहट, सुस्ती, थकान, नाड़ी दुर्बलता, शरीर दुर्बल होते जाना तथा नींद नहीं आना जैसी समस्याएं होती है.

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रोग का निदान-

भूख ना लगना, भोजन के बाद पेट में भारीपन अथवा दर्द होना, मलावृत्त जिह्वां, मितली या बमन होना, मुंह में पीला, हरा पानी आना, सिर में भारीपन, तबीयत का गिरा रहना, पेट में गैस बनना आदि लक्षणों से इसके निदान में कोई कठिनाई नहीं होती है.

रोग के अधिक समय तक बने रहने से पेट में गैस बनने लगती है. जिससे स्नायु दुर्बलता, सिर चकराना, नींद नहीं आना, दिल का धड़कना आदि विकार उत्पन्न हो सकते हैं.

अग्निमांद्य का सामान्य चिकित्सा-

  • रोग के प्रमुख कारणों की चिकित्सा करने से अजीर्ण खुद ही ठीक हो जाता है.
  • आमाशय रस की कमी में आमाशय रस बढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिए.
  • यथासंभव दीपन- पाचन औषधियां देनी चाहिए.
  • मानसिक उत्तेजना से बचना चाहिए.
  • हल्का शारीरिक श्रम, प्रातः कालीन भ्रमण तथा नित्य स्नान करें.
  • अधिक मैथुन, दिवाशयन, रात्रि जागरण तथा मिथ्या आहार-विहार का त्याग करें.
  • खाने के बाद ब्रांडी एक चम्मच 100 मिलीलीटर पानी में मिलाकर पिएं.
  • यदि दांत में कोई रोग हो तो उसकी समुचित चिकित्सा करें.
  • भोजन के समय अधिक पानी नहीं पीना चाहिए. भोजन के बीच- बीच में आधा गिलास पानी पर्याप्त होता है.
  • भोजन में अन्य वस्तुओं की मात्रा घटाकर दूध, दही की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए. लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि दूध अधिक गाढ़ा नहीं होना चाहिए.
  • कभी-कभी उपवास भी करना चाहिए.
  • अम्लाधिक्य तथा पेप्टिक अल्सर की अवस्था में तंबाकू तथा सिगरेट का सेवन बिल्कुल बंद कर देना चाहिए.
  • अग्निमांद्य से पीड़ित व्यक्ति को लघु, पाचक आहार, पुराने चावल का भात, कच्चे पपीते का सब्जी आदि दें. पका हुआ पपीता इसमें विशेष उपयोगी होता है.
  • इस रोग में विशेषकर कोष्टबद्धता का निराकरण करना चाहिए.

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अग्निमांद्य का आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय-

1 .सुबह एक गिलास ठंडा पानी पीना चाहिए और आधा घंटा घर घूमना चाहिए.

2 .काली द्राक्ष 13 दाने तांबे के एक गिलास पानी में डालकर रखें. सवेरे द्राक्ष को खाकर ऊपर से पानी पिए और हल्का भोजन करें तो कब्ज दूर हो जाएगी.

3 .1-2 अंजीर रात को दूध के साथ सेवन करें या छोटी हरड़ घी में या एरंड के तेल में तलकर कूटकर 1-2 ग्राम रात को पानी से या दूध के साथ सेवन करें या त्रिफला चूर्ण या स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में दिन में एक दो बार सेवन करें.

4 .लवण भास्कर चूर्ण 1 ग्राम, हिंग्वाष्टक चूर्ण 1 ग्राम और सज्जीखार आधा ग्राम ऐसी 3-4 मात्राएं दिन में लें.

5 ,शंख वटी या अग्निकुमार रस या लहसुनादि वटी या संजीवनी वटी दो गोली दिन में 3-4 बार सेवन करें.

6 .अमृतधारा कुछ भी खाने के बाद दो बूंद आधा गिलास पानी में डालकर पियें.

7 .अरुचि हो तो दाडिमाष्टक चूर्ण या चित्रकादि वटी और द्राक्षासव या कुमार्यासव 10 ml के साथ सेवन करें.

8 .नींबू का रस 50 ग्राम, अदरक का रस 50 ग्राम, काला नमक 10 ग्राम, शहद 50 ग्राम सभी को मिलाकर किसी सीसी में सुरक्षित रखें. अब 10 से 15 ग्राम की मात्रा में दिन में तीन बार पिएं. इससे अग्निमांद्य की समस्या दूर हो जाती है.

9 .बिड़ नमक, अजवाइन, सफेद जीरा, काला जीरी, हरे, चित्रक, सोठ, काली मिर्च, पीपल, अमलवेत, अजमोद, धनिया सभी को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रखें. अब इसमें से 3 से 4 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से उदर विकार, अग्निमांद्य तथा अरुचि दूर हो जाता है.

10 .थूहर के दूध में चावल भिगोकर फूल जाने पर इसका पुआ बनाकर 7 दिन खाने से उदर के विकार, अजीर्ण, प्लीहा, जलोदर आदि दूर हो जाते हैं.

11 .यदि विरेचन की आवश्यकता हो तो दूध या गोमूत्र के साथ 1 चम्मच अरंडी का तेल रात को सोने से पहले रोगी को पीला दें सुबह पेट साफ हो जाएगा.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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