जलोदर होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार

रोग परिचय- जलोदर, जलंदर, उदर में पानी भर जाना, Ascites नाम से इसे जाना जाता है. यह एक ऐसी क्लीनिकल अवस्था है जिसमें उदरावरण कोष में पानी जमा हो जाता है. यह सिरोसिस ऑफ द लिवर, दक्षिण हृदय कन्जेस्टिव फेल्योर, नेफ्रोटिक सिंड्रोम तथा एब्डोमिनल ट्यूबरक्लोसिस का एक कॉमन उपद्रव होता है.

जलोदर होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार
जलोदर होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार

प्रायः यकृत की बीमारी की अंतिम अवस्था में पेट पर सूजन आ जाती है और पेट में पानी जमा हो जाता है इसे ही जलोदर कहते हैं.

जलोदर होने के कारण-

  • ट्यूबरकुलस पेरीटोनाइटिस.
  • सिरोसिस ऑफ द लीवर.
  • हाइपोप्रोटिनीमिया.
  • ह्रदय रोग.
  • ट्राई कस्पीड डिजीज.
  • कंस्ट्रक्टिव पेरिकार्डाइटिस.
  • गंभीर ह्रदय फेल्योर.
  • हेपेटिक वें थ्रांबोसिस.
  • मेलिग्नेंसी.
  • गुर्दे की बीमारी.
  • प्लीहा एवं फुसफुस रोग.
  • प्रणासी रक्त क्षीणता.
  • ल्यूकीमिया
  • डिंब ग्रंथि के अर्बुद.
  • पर्युदर्या का हाईडेटीड रोग.
  • क्षय जन्य या कैंसर जन्य पेरीटोनाइटिस.

नोट- जलोदर की दशा अनेक कारणों से उत्पन्न हो सकती है. यह कोई स्वतंत्र रोग नहीं है बल्कि दूसरी रोगों का लक्षण है. यकृत की अंतिम अवस्था में यह बीमारी हो जाती है. वास्तव में यह एक लक्षण मात्र है.

इसमें सामान्य एकत्रित हुआ द्रव एक पारस्राव होता है जो हल्के पीले रंग का होता है. इसका विशिष्ट गुरुत्व 1.015 होता है. उसमें कुछ सैल्स भी होती है और प्रोटीन 2% होता है.

दूसरी प्रकार का एकत्रित द्रव सीरम होता है. इस को सिरों पेरीटोनियम कहते हैं. यह सिरम पेरीटोनियम केविटी में एकत्रित होता है. इसका विशिष्ट गुरुत्व 1.015 से अधिक होता है. प्रोटीन भी 3% से ज्यादा होती है. इसका रंग गहरा होता है. सेल की संख्या ज्यादा होती है.

तीसरे प्रकार के रोग में द्रव में रक्त मिला होता है. इसमें रक्त कणिकाएं उपस्थित रहती है. रक्त भी पीलापन लिए हुए होता है. इसे हीमोंपेरीटोनियल भी कहा जाता है.

एक अन्य प्रकार के द्रव में काइल मिला रहता है.

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जलोदर के लक्षण-

सामान्य लक्षण- 1 .कारणों के अनुसार लक्षण में तथा रोगी की सामान्य दशा में अंतर होता है.

2 .उदर प्राचीर पर शिराओं का फूलना, पैरों में सूजन, सांस फूलना, नाभि का बाहर की ओर फुल जाना आदि लक्षण होते हैं.

3 .शुरुआत में पेट में पानी जमा हो जाने से पेट के सामने वाला बड़ा और ऊंचा दिखलाई देता है. पेट में पानी ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है त्यों-त्यों वह पानी पेट के दोनों तरफ और नीचे की ओर फैलता जाता है.

4 .पानी जब पेट में ऊपर- नीचे सभी जगह फैल जाता है तब पेट चिपटा दिखलाई देने लगता है.

5 .उदर का फैल जाना इस रोग का प्रधान लक्षण होता है. उदर प्रायः एक समान विस्तृत होता है.

6 .द्रव की अधिक मात्रा होने पर उदर ऊपर की ओर अर्थात वक्ष से भी ऊपर ऊंचा उठा हुआ होता है.

7 .नाभि बाहर को निकली हुई दिखलाई देती है. नाभि की चारों शिराएँ परिवर्धित दिखलाई देती है.

8 .रोगी के क्षीण अंग- बाहु, टांगे आदि तथा चेहरा उसके विस्तृत उदर की अपेक्षा अत्यंत क्षीणता का चित्र उपस्थित करते हैं.

9 .द्रव के अधिक हो जाने पर रोगी का उदर सदैव भरा सा प्रतीत होता है. उसके और अधिक बढ़ जाने पर सांस लेने में तकलीफ होने लगता है. रोगी का चलना- फिरना भी मुश्किल हो जाता है.

10 .रोगी का ह्रदय तेज धड़कता है.

11 .कभी-कभी प्यास की अधिकता भी होती है, अधिकांश रोगी को कब्ज की समस्या रहती है.

12 .पेशाब की मात्रा बहुत कम हो जाती है. वृक्क की शिराओं पर जल का दबाव पड़ने से पेशाब में अल्ब्यूमिन भी आता है.

जलोदर के कारणों के अनुसार अन्य लक्षण भी होती हैं जैसे-

1 .यकृत वृद्धि जनित जलोदर- इस प्रकार का जलोदर यकृत रोगों के परिणाम स्वरुप यकृत के अंदर की पोर्टल वेन तथा पोर्टल कैपिलरीज में रक्त संचय तथा रक्त भार के बढ़ जाने से तथा पोर्टल सिस्टम अथवा कोष्णगत आशयों की दीवारों में से जल भाग के इस कोष में रिश-रिश कर बाहर निकलने से होता है. मध्यम आयु का रोगी जब अधिक समय तक अथवा वर्षों तक यकृत रोग का रोगी रहता है तब यह उपद्रवस्वरूप हो जाता है.

विशिष्ट लक्षण-

  • इसमें पोर्टल हाइपरटेंशन के कारण प्लीहा का भी कुछ लक्षण रहता है.
  • यकृत बड़ा और कठोर होता है.
  • जलोदर से पेट तो भरा होता है पर शाखाएं कृष दिखलाई देती है.
  • यह सबसे ज्यादा मिलने वाला जलोदर है

2 .वृक रोग जन्य जलोदर- वृक रोग के कारण जब मूत्र के द्वारा बहुत सारा एल्ब्यूमिन निकल जाता है और रक्त में प्रोटीन की मात्रा 5% से कम हो जाती है तब सर्वांग श्वयथु का रोग हो जाता है. इस अवस्था में पेरिटोनियम केविटी में भी जल भरने लगता है. इस प्रकार का जलोदर रोग सर्वांग श्वयथु का ही एक भाग होता है.

विशिष्ट लक्षण-

  • इस अवस्था में चेहरे, पाँव आदि के शोथ के साथ या बाद में हल्के जलोदर का लक्षण होता है.
  • पेशाब में एल्ब्यूमिन तथा कास्ट्स की उपस्थिति तथा रक्त में कोलेस्ट्रॉल की वृद्धि एवं रोगी के श्वेत वर्ण तथा फूले हुए शरीर को देखकर इसका निदान हो जाता है.

3 .हृदय रोग जनित जलोदर- कार्डियक डाइलेटेशन के रोग में जब चीरस्थायी कास तथा श्वास के कारण दक्षिण हृदय में निर्बलता आ जाती है, तब शरीर की शिराओं में रक्त भार बढ़ जाता है तथा उसकी दीवारों को ऑक्सीजन कम मिलती है एवं उसमें निर्बलता आ जाती है, जिससे उन में से पानी का भाग अधिक मात्रा में बाहर निकलने लगता है. पानी के साथ नमक भी अधिक मात्रा में निकल कर अवयवों में एकत्रित हो जाता है. इस प्रकार पोर्टल में कैपिलरीज में रक्त भर बढ़ने से जलोदर हो जाता है.

विशिष्ट लक्षण-

  • इसमें प्रथम बाया हृदय निर्बल हो जाता है जिससे श्वासकृच्छता तथा खांसी का लक्षण पहले होता है.
  • इसके कुछ समय पश्चात दक्षिण ह्रदय के निर्बल हो जाने पर पैरों में शोथ होता है और उसके बाद जलोदर का लक्षण मिलता है.
  • ग्रीवा की जुगलर वेन इस रोग में फुली हुई दिखाई देती है जो इसका विशिष्ट लक्षण है.
  • यकृत में वृद्धि तथा स्पर्शाक्षमता का लक्षण मिलता है.

4 .उदर रोग जनित जलोदर- पेरीटोनियम में शोथ हो जाने के परिणाम स्वरूप इस कला में से स्राव होकर जलोदर हो जाता है. इस प्रकार का जलोदर विशेष रूप से 5 से 10 वर्ष की आयु के बालकों में पेरीटोनियम में क्षय के जीवाणु के संक्रमण कर जाने से होता है.

विशिष्ट लक्षण-

  • बालक का पेट भरा हुआ स्थूल होता है पर उसके हाथ-पांव आदि अंत कृश होते हैं.
  • रोगी को शाम के समय बुखार रहता है.
  • निम्न कोष्ठ पर स्पर्शन से गूथे हुए आटे अथवा मांस खंडो जैसी प्रतीत होती है.
  • पेट से निकले जल की स्पेसिफिक ग्रेविटी 1.018 के लगभग होती है.

5 .कैंसर जनित जलोदर- जब जलोदर 55 वर्ष की उम्र से ऊपर वाली अवस्था में होता है तो यह ज्यादातर रूप से कैंसर के कारण होता है. इसमें सबसे पहले आमाशय तथा गुदा में कैंसर प्रारंभ होता है. वहां से उसके सेल लसिका वाहिनियों के द्वारा पेरीटोनियम में प्रसरण कर जाते हैं अथवा वहां से यह रोग लसिका वाहिनियों के द्वारा पोर्टल फिशर में विधमान लिंफ गलैंड्स में संक्रमण कर जाता है और उन बढ़ी हुई ग्रंथियों के दबाव के कारण पोर्टल वेन के दब जाने से पेरिटोनियम में जल भरने लगता है.

विशिष्ट लक्षण-

  • यकृत अत्यंत कठोर तथा आकार में बड़ा होता है.
  • उदर गुहा में भरे जल में रक्त का मिश्रण होता है. यदि इसे निकाल दिया जाए तो भी पुनः भर जाता है.
  • जल की स्पेसिफिक ग्रेविटी 1.015 से ज्यादा होती है.
  • इस अवस्था में प्रायः यकृत प्रदेश पर एवं दाहिने कंधे पर अथवा उधर की पीठ पर दर्द होने का लक्षण मिलता है.
  • कभी-कभी कामला का लक्षण भी मिलता है.
  • रोगी में हल्का बुखार तथा स्पर्शाक्षमता के लक्षण मिलने पर वह अति कृश हो जाता है.

महिलाओं में ओवेरियन सिस्ट से भेद-

1 .सिस्ट की स्थिति में पाश्र्वों पर टकोर की आवाज ऊंची होती है तथा सामने के प्रदेश पर टकोर मंद होती है.

2 .पेट की मोटाई सबसे अधिक नाभि के नीचे के प्रदेश में होती है.

रोग निदान- उपर्युक्त लक्षणों के आधार पर निदान में कोई कठिनाई नहीं होती है. द्रव की उपस्थिति का निश्चय करने के लिए दो विशेष परीक्षाएं की जाती है. इसमें रोगी को लिटा कर परिदर्शन के पश्चात परिस्पर्शन तथा परिताडन से द्रव मालूम किया जाता है जो इस प्रकार है-

1 .लेटे हुए रोगी के उदर के एक पार्श्व पर एक हाथ फैलाकर रखने के पश्चात दूसरे पार्श्व पर कर दूसरे हाथ की एक या दो अंगुलियों से ताड़न किया जाता है. इससे द्रव में उत्पन्न हुई तरंग दूसरे पार्श्व में पहुंचकर वहां पर रखे हुए हाथ में प्रतीत होती है. इसे द्रव की तरंग कहते हैं. उदर पर नाभि के पास परिताड़न करने से ध्वनिमय शब्द होता है क्योंकि वहां द्रव नहीं होता है.

2 .यदि रोगी को करवट में लिटा कर दोनों पार्श्वों पर परिताड़न किया जाए तो नीचे के पास पार्श्व से ठोस शब्द निकलेगा और जो पार्श्व ऊपर की ओर है उससे ध्वनिमय शब्द होगा. लेकिन उदर के मध्य भाग से भी ठोस शब्द ही निकलेगा.

जलोदर के अन्य लक्षण-

  • रोगी जिस करवट में सोता है उसी ओर का पेट फूल जाता है, तरल पदार्थों का हिलना अथवा घटना- बढ़ना करवट बदलने से मालूम होता है.
  • इसकी चिकित्सा नहीं करने से पेट के अधिक बढ़ जाने से रोगी को बेचैनी होती है. चलने- फिरने तथा उठने- बैठने में भी परेशानी होता है. इस रोग को सर्वदा अति विषम अवस्था समझनी चाहिए. कम ही रोगी इस रोग से मुक्ति पाते हैं.

जलोदर के सामान्य चिकित्सा विधि-

  • इसकी चिकित्सा रोग के कारणों के अनुसार की जाती है.
  • जलोदर से ग्रसित रोगी को नमक रहित आहार देना चाहिए, साथ ही जल की मात्रा भी कम कर देनी चाहिए.
  • धूम्रपान, शराब का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए.
  • आहार व्यवस्था में अंडा, मांस, मछली, फल, सब्जी आदि दी जा सकती है.
  • जल की मात्रा को कम करने के लिए तीव्र बिरेचक तथा मूत्रल चीजें देनी चाहिए.
  • रोगी का पेट हमेशा साफ रखना चाहिए उसे कब्ज कभी नहीं होने देना चाहिए.
  • जब रोगी को उठने बैठने या सांस लेने में तकलीफ होने लगे तब पेट में नली प्रविष्ट करा कर उदर से पानी निकाल देना चाहिए.
  • रोगी को पूर्ण विश्राम की अवस्था में रखना चाहिए.

जलोदर का घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार-

1 .पीपली चूर्ण को बकरी के दूध में पीसकर मटर के बराबर गोली बना लें. अब इसमें से सुबह-शाम दो-दो गोली सेवन करें या सुखविरेचनी वटी दो-दो गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन कराएँ.

2 .आरोग्यवर्धिनी वटी दूध के साथ और पुनर्नवादि मंडूर दो-दो गोली मूत्रलक्वाथ या पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करें.

3 .पीने के लिए पानी के बदले कचनार की छाल का क्वाथ बनाकर पिलाएं.

4 .ऊंटनी का दूध जलोदर के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है.

5 .पुनर्नवादि क्वाथ में नृपार, यवक्षार, सज्जीक्षार आदि डालकर पीना भी फायदेमंद होता है.

6 .पुनर्नवा का साग रोगी को रोजाना खिलाएं इससे पेट साफ रहता है और पेशाब भी खुलकर आता है.

7 .पिप्पल्यादि वटी- काली मिर्च, पीपल, पांचो नमक, खिल सुहागा, सज्जीक्षार सब बराबर मात्रा में लें. अब सभी के बराबर शुद्ध जमालगोटा लेकर पीसकर दंती के रस तथा नींबू के रस की 3-3 भावना देकर छोटे मटर के बराबर गोली बना लें. अब आधा से एक गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करें. इसके सेवन से जलोदर, गुल्म, प्लीहा, यकृत आदि उदर विकार नष्ट होते हैं. यह तेज जुलाब है दूध भात का सेवन करें.

8 .छोटी पीपल का चूर्ण कर थूहर के दूध का 21 भावना देकर छोटे मटर के बराबर गोली बना लें. अब इसमें से एक से दो गोली सौंफ के शरबत के साथ सेवन करने से जलोदर, यकृत की समस्या दूर हो जाती है.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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