पेट में कृमि ( कीड़ा ) होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय

हेल्थ डेस्क- परजीवी कृमियों कि मनुष्य की आंत में उपस्थिति को कृमिरुग्णता कहते हैं. इसे कई नामोमों से जाना जाता है जैसे- कृमिरुग्णता, इन्टेस्टाइनल वर्म्स, आंत्र कृमि, आँतों में रहने वाले कीड़े.

पेट में कृमि ( कीड़ा ) होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय

मुख्य रूप से निम्नलिखित चार प्रकार के कृमि मनुष्य की आंतों में पहुंचकर निम्न प्रकार की लक्षण उत्पन्न करते हैं.

वे 4 कृमि इस प्रकार हैं.

1 .गोल कृमि (Round worm )

2 .सूत्र कृमि ( Thread worm )

3 फीता कृमि (Tape worm )

4 .अंकुश कृमि ( Hook worm )

1 .गोल कृमि ( Round worm )-

चिकित्सा के क्षेत्र में गोल कृमियों का नाम एस्केरिस लम्ब्रीकॉइडिस है इन्हें अंग्रेजी में एस्केरिस एवं हिंदी में गंडूपद कृमि की संज्ञा दी जाती है. इसलिए गोल कृमियों की आंतों में उपस्थिति को स्केरिएसिस कहते हैं.

यह कृमि मिट्टी, गंदा जल, शाक, मधुर पदार्थ आदि के सेवन से आंत मे सफेद रंग के गोल कृमि पैदा हो जाते हैं. इस प्रकार इन कृमियों के कारण पेट में दर्द रहती है एवं पेट फूल जाता है. सोते समय दांतों को कटकटाना, बच्चों का नींद में उठना, नाक के अग्रभाग एवं गुदा में खुजली आदि कष्टदायक लक्षण होते हैं. दस्तों में इन कृमियों की उपस्थिति मिलती है.

कृमि का जीवन चक्र- यह कृमि बालकों तथा नवयुवकों की छोटी आंत में बिछड़ने वाला है और वहां विधमान आहार में रहने वाला गोल आकृति का पारदर्शक, श्वेत भूरे रंग का, दोनों सिरों पर नुकीली आकृति का होता है. इसका नर कृमि 6-7 इंच और मादा कृमि 8- 10 इंच लंबा होता है. मादा कृमि के दो लाख की संख्या में एंब्रियो मल के साथ बाहर आते हैं और गर्मी तथा खुश्क में भी चिरकाल तक जीवित रह सकते हैं. इस प्रकार धूल व जल आदि में जहां एंब्रियो बन जाते हैं दूसरों के पेट में पहुंच जाते हैं.

ड्यूडेनम में इनसे लार्वा निकल कर श्लेष्मकला को छेद कर यह ह्रदय, यकृत आदि अंगों में पहुंचकर बढ़ते हैं. इसके बाद यह वायु पथ में पहुंचकर ग्रासनली से होते हुए शूद्र आंत को अपना निवास स्थान बनाते हैं.

इन कृमियों को पूर्ण आकार का व्यस्क बनने में 1 माह का समय लगता है. इस कृमि के गुच्छे छोटी आंत के प्रथम भाग में रहते हैं तथा आंत में विधमान भोजन पर पलते हैं जिससे बालक तथा नवयुवकों का पोषण कम हो जाता है. जिसके कारण वे कमजोर होने लगते है.

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पेट में गोल कृमि होने के लक्षण-

1 .अजीर्ण संबंधी लक्षण- क्षुधानाशअथवा अतिक्षुधा, पेट दर्द, पांडुता आदि लक्षण मिलते हैं.

2 .एलर्जी जन्य लक्षण- शीतपीत, इडिमा, श्वास- कास आदि लक्षण मिलते हैं.

3 .कृमियों के फुफ्फुस में वृद्धि करने के परिणाम स्वरुप- खांसी तथा न्युमोनिया हो जाता है. संक्रमण जब साधारण स्वरुप का होता है तो रोगी में केवल खांसी तथा बुखार मिलता है. लेकिन संक्रमण उग्रस्वरुप का हो जाता है तो श्वास लेने में कष्ट होता है. सांस के साथ घर्र- घर्र की आवाज निकलती है.एवं कभी- कभी रक्तनिष्ठिवन भी मिलता है.

4 .वात प्रधान लक्षण- रात को दांत किटकिटाना, नींद नही आना, चिडचिडापन, आक्षेप, कृशता आदि लक्षण भी मिल सकते हैं.

5 .बुखार की उपस्थिति- गोल कृमि के कारण बुखार के लक्षण मिल सकती है.

6 .यकृत संबंधी लक्षण- किसी- किसी रोगियों में यकृत भी बढ़ जाता है.

कृमि की व्यस्क अवस्था के लक्षण-

मृदु स्वरुप के संक्रमण- आन्त्रशूल के लक्षण मिलते हैं.कभी- कभी मल के साथ व्यस्क कृमि निकलते हैं.

उग्रस्वरुप का संक्रमण- इनकी संख्या अधिक होती है तो आंत्रवरोध के लक्षण उत्पन्न हो सकते है.

इस अवस्था में कृमियों का एक गुच्छा सा बनकर आंत्रमार्ग को रोक देता है. जिससे मल के ऊपर ही रुकने के कारण रोगी के प्राण संकट में पड़ जाते हैं. कुछ रोगियों में गुच्छे के रूप में 200 तक कृमि मिल सकते हैं.

विशिष्ट लक्षण- कृमियों की आँतों में उपस्थिति के कारण-

1 .अपावशोषण

2 .कुपोषण

3 .आध्मान आदि सामान्य लक्षण प्रायः मिलते हैं.

नोट- कभी- कभी यह कृमि ऊपर चलकर आमाशय में पहुच जाते हैं और उल्टी के साथ बाहर निकलते हुए देखे जाते हैं.

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2 .सूत्र कृमि ( Thread worm )

सूत्र कृमि का वैज्ञानिक नाम एंटीरोबियस वर्मीक्यूलैरिस थ्रेड वर्म है. इस संक्रमण को इंटेरोबिएसिस कहते हैं. इन कृमियों को गुदाकृमि, ऑक्सीयुरिस वर्मीकुलेरिस, पिन वर्म्स, ऑक्सी-युरिएसिस आदि नामों से जाना जाता है.

सामान्य भाषा में इसे चुरने भी कहते हैं. इसके कारण नाक का अग्रभाग अथवा गुदामार्ग खुजलाता है. सांस से बदबू आती है.दस्त के समय बहुत दर्द होता है. गुदा मार्ग को खुजलाते रहने से नींद नही आती है. सोते समय बालक दांतों को कटकटाता है. प्रायः दस्त के साथ सफ़ेद रंग के सूत्र कृमि निकलते रहते हैं. यह वयस्कों में भी होता है.

संक्रमण का क्रम- हमारे देश में इन कृमियों का संक्रमण अति व्यापक रूप से मिलता है. बड़ों के साथ ही विशेष रूप से बच्चों के मल में तथा गुदा पर एक छोटा सा श्वेत वर्ण का सूत्राकार कृमि पाया जाता है नर कृमि प्रायः बाहर नहीं आता इसलिए वह देखने को कभी नहीं मिलता है. वह लगभग 3 मिलीमीटर लंबा होता है मादा कृमि प्रायः गुदा पर आ जाते हैं वह लगभग 10 मिलीमीटर तक लंबा होता है. गुदा की समीपवर्ती त्वचा पर इनके सहस्त्रों अंडे पाए जाते हैं .जहां से वह अंगुली एवं नाखूनों के माध्यम से अपने व दूसरों के मुंह एवं पेट में पहुंच जाते हैं अथवा गुदा को साफ करने के लिए जो पानी प्रयोग में लाया जाता है उसमें यह अंडे पहुंच जाते हैं. जब यह पानी किन्ही कारणों से पीने के सुरक्षित जल में मिल जाता है तो वह पानी भी संक्रमित हो जाता है और वह पानी पीने वाला व्यक्ति भी सूत्र कृमि का रोगी बन जाता है.

यह कृमि आंतों में पहुंचकर कुछ दिन बाद अण्डों से लार्वा निकलते हैं और यह लार्वा बड़ी आंत और मलाशय की ओर बढ़ते रहते हैं वहां बढ़कर यह व्यस्क रूप ले लेते हैं.

पुनरावर्तन क्रम- इसका संक्रमण बार-बार होता रहता है. अंडों की उपस्थिति के कारण गुदा में खुजली होती है खुजलाते समय अंडे रोगी की अंगुलियों तथा नाखूनों में लग जाते हैं. इन अंगुलियों के मुंह में लगने अथवा खाद पदार्थों में लगने के कारण उन पर उपस्थित अंडे आंतों में प्रवेश कर जाते हैं और पुनः संक्रमण की अवस्था उत्पन्न हो जाती है. इस प्रकार से संक्रमण का क्रम चलता ही रहता है.

सूत्र कृमि से उत्पन्न लक्षण-

  • गुदा और उसके आसपास रात को भारी खुजली पाई जाती है.
  • इस्नोफीलिया का लक्षण भी मिलता है.
  • रोगी को भूख नहीं लगती है.
  • पेट में कष्ट होता है.
  • लड़कियों में भगयोनि- शोथ वृद्धि कर जाता है.
  • यदि कृमियों की संख्या ज्यादा है तो खुजली की अधिकता के कारण रोगी को नींद नहीं आती है.
  • कुछ रोगियों में अरुचि भी देखने को मिलती है.

3 .फीता कृमि (Tape worm )-

फीता कृमि अनेक प्रकार के होते हैं और उन सब को सिस्टोड वर्ग अथवा टेनाई, टेनीएसिस के अंतर्गत रखा जाता है. यह ह्यूमन पैरासाइट टीनिया सेजिनेटा, विफ टेप वर्म तथा टीनिया सोलियम होते हैं. इन्हें सामान्य बोलचाल की भाषा में कद्दू दाने भी कहते हैं.

इन सभी कृमियों के शरीर फीते के समान लंबे तथा चपटे होते हैं. इनमें हुक के समान संरचनाएं होती है जिनकी सहायता से यह कृमि आंतों में चिपका रहकर आँतों से अपना आहार लेता है. इसका शरीर अनेक खंडों में विभाजित रहता है. किसी- किसी में 200 खंड तक होते हैं. समस्त कृमियों को देखने से ऐसा लगता है कि मानो फीते के छोटे-छोटे टुकड़े आपस में जोड़ दिए गए हैं. इनका अंतिम खंड गर्भाशय होता है जिसमें अंडे भरे रहते हैं.

इस वर्ग के दो कृमि मनुष्य में प्रधान रूप से रोग उत्पन्न करते हैं.

1 .टीनिया सेजीनेटा.

2 .टीनिया सोलियम.

1 .टीनिया सेजी नेटा- यह कृमि कई मीटर तक लंबा पाया जाता है और गाय- भैंस की आंतों में रहता है. इन कृमियों के सिस्ट इन जानवरों की मांसपेशियों में रहते हैं. बकरी में भी यह अधिकांश रूप में मिलते हैं.

जब व्यक्ति इन गाय- भैंस, बकरी आदि का मांस खाता है तो इनकी के सिस्ट मनुष्य की आंतों में चले जाते हैं और वहां जाकर यह फट जाते हैं जिससे लार्वा निकल आते हैं. सिस्ट एक अंडा है जो एक कठोर आवरण को ढका होता है. यह आवरण मांस के पकाने से भी खत्म नहीं होता है. लार्वा 3 माह में व्यक्क ( बड़ा ) बन जाता है और जेजूनम को अपना निवास स्थान बना लेता है.

लक्षण-

व्यक्ति का वजन कम होने लगता है, भूख अधिक लगती है, पेट में दर्द होता है, पेट में गड़गड़ाहट इसका विशेष लक्षण है जो सुनाई देता है, पेट का दर्द नाभि के आसपास या हाइपोक्रोडियम में होता है.

2 .टीनिया सोलियम- यह कृमि सूअर में अधिकतर में रहते हैं. इनके सिस्ट उसकी मांस पेशियों में रहते हैं. यह सिस्ट अंडा ही होता है जो लार्वा बनकर सूअर की मांस पेशियों में पड़ा रहता है.

सूअर के अर्धपका हुआ मांस को खाने से यह सिस्ट मनुष्य के आमाशय में चला जाता है और आमाशय की रस क्रिया से आवरण घुल जाता है और स्वतंत्र लार्वा निकल आता है. यह लार्वा मनुष्य की स्थित मांसपशियों अथवा मस्तिष्क को अपना निवास बनाते हैं.

प्रारंभिक लक्षण- बुखार, सिर दर्द, शितपित एवं इओसिनोफीलिया से संबंधित लक्षण मिलते हैं.

मांस पेशियों तथा त्वचा पर स्थानीय लक्षण लगभग 3 से 7 वर्ष बाद दिखलाई देते हैं. इस समय त्वचा पर हाथ फेरने से सिस्ट दानों की भांति प्रतीत होते हैं.

जब इनकी संख्या अधिक होती है तब यह मस्तिष्क में पहुंच जाते हैं जिससे मिर्गी के समस्त लक्षण दिखलाई देते हैं. मस्तिष्क में मृत सिस्ट जमा होते रहते हैं. जिन्हें एक्स-रे द्वारा देखा जा सकता है. मांस पेशियों में मृत सिस्टों की गांठे तथा नीचे की त्वचा एक्स-रे में दिखलाई देते हैं.

कृमियों के आंत से भोजन लेने के कारण रोगी को अतिक्षुधा तथा कृशता की शिकायत रहती है.

यह कृमि थोड़ी देर निकलने के बाद भी हिलते रहते हैं मल में देखकर इस कृमि का निश्चय हो जाता है. इनमें से निकले हुए अंडे तथा ओवा सप्ताहों तक जीवित रहते हैं और सूअर के पेट में पहुंच जाते हैं. इस प्रकार इन कृमियों का जीवन चक्र सूअर और मनुष्य शरीर में बराबर करता रहता है.

अन्य लक्षण- इनकी उपस्थिति से मल द्वार कुटकुटाता है. रोगी अपनी नाक खुजलाता है. साथ ही दांत पीसता है. मुंह में पानी भर आना, सिर चकराना, ह्रदय धड़कना, कानों में वह भों-भों आवाज होना, खट्टी डकार आना, अफारा, अत्यंत बदले दस्त एवं कभी-कभी दर्द आदि के लक्षण भी मिलते हैं.

4 .अंकुश कृमि ( Hook worm )-

हुकवर्म को एंकिलोस्टोमा ड्यूडीनेल कहते हैं. नेक्टार अमेरिकैन्स नामक कृमि भी इस रोग का कारण होता है. भारत में 60% लोगों ने इसका संक्रमण मिलता है.

हुकवर्म का जीवन चक्र- हुकवर्म के अंडे रोगी के मल द्वारा बहुत संख्या में बाहर निकलते हैं. गर्म एवं आर्द्र प्रदेश में रहने से इनके लार्वा निकलकर घास पर पलते हैं. यह जल, भोजन तथा नंगे पैर चलने वाले व्यक्तियों के पैरों की अंगुलियों के बीच की त्वचा को छेद कर उसकी रक्त अथवा लसिका वाहिनी द्वारा फेफड़े में पहुंच जाते हैं. जहां से कंठनली में और वहां से शरीर में प्रवेश कर 1 महीने के अंदर-अंदर मुख द्वारा आंत में पहुंच जाते हैं. यह छोटी आंत की प्रथम भाग की श्लेष्मिक कला में चिपके हुए पड़े रहते हैं. यह कृमि रोगी के मल से सीधे पोषण लेते हैं. आँतों में कुछ समय बाद यह लार्वा पूर्ण विकसित कृमि बन जाते हैं. नर कृमि प्रायः 1 सेंटीमीटर तथा मादा कृमि डेढ़ सेंटीमीटर लंबा होता है. इन कृमियों का रंग लाल होता है. इनके मुंह में 6 दांत होते हैं जिनके सहारे यह आँतों से चिपके रहते हैं.

हुक वर्म के लक्षण एवं चिन्ह-

यदि इनकी संख्या अधिक हो तो खून की कमी हो जाती है, इससे रोगी को तीव्र पांडु रोग हो जाता है. हृत्कंप, निर्बलता तथा इस्नोफिलिया के लक्षण मिलते हैं. थोड़े ही परिश्रम से रोगी का श्वास फूलने लगता है, भूख नहीं लगना तथा हृदय की धड़कन अधिक हो जाती है शरीर का वजन कम होने लगता है.

रोग निदान-

मल में अंडों की उपस्थिति निदान में विशेष से मददगार होती है. इसलिए रोग की संभावना होने पर मल की माइक्रोस्कोपिक परीक्षा अवश्य करनी चाहिए. मल के 1 ग्राम में लगभग 5000 ओवा मिलते हैं.

तीव्र पांडु के लक्षणों को देखकर इसको का निश्चय हो जाता है

नोट- दिन प्रतिदिन खून की कमी बढ़ते जाना, पाचन शक्ति का कमजोर हो जाना, दिल की धड़कन, नेत्र की ज्योति कम होना, पेट में सूजन होना, प्लीहा और यकृत में बढ़ोतरी होना, थकावट, बच्चों के विकास में कमी, खून की कमी, भार में कमी आदि लक्षणों से भी पेट में कीड़े होने का निदान संभव है. चेहरे व हाथ- पैर की सूजन को अन्य रोगों से अलग करें. ग्राउंड इंच का मिलना इस रोग का सामान्य लक्षण है.

पेट के कीड़े ( कृमि ) दूर करने के आयुर्वेदिक उपाय-

1 .आमाशय और पक्वाशय की सफाई करने के लिए सबसे पहले विरेचन दें. इसके लिए स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण या चेतकी चूर्ण या कपिला चूर्ण का प्रयोग करें.

2 . भाभी रंग का चूर्ण 1 ग्राम कि मात्रा में सुबह- शाम शहद के साथ सेवन कराएं और कृमिघ्न वटी या कृमिमुदगर रस 2 वटी सुबह- शाम पानी या अनार छाल, बायविडंग, नागरमोथा और इन्द्रायण बराबर मात्रा में लेकर अधकुटा करके 20 ग्राम को 80 ग्राम पानी में डालकर उबालें जब पानी 20 ग्राम रह जाए तो 2 भग करके इसके साथ वटी का सेवन करें. इस प्रकार कुछ दिनों तक इन औषधियों का सेवन करने से हर प्रकार के कृमि नष्ट होकर भूख अच्छी लगने लगेगी और स्वास्थ्य में सुधार होगा ( नोट- यह बड़ों कि मात्रा है बच्चों के लिए उम्र के अनुसार घटाई जाएगी )

3 .संजीवनी वटी, कुमारी आसव, हिंग्वाष्टक चूर्ण और चित्रकादि वटी भी उत्तम है.

पेट के कीड़े दूर करने के घरेलू उपाय-

4 .नागरमोथा, मूसाकरणी, त्रिफला, सहजन की छाल और देवदार का क्वाथ बनाकर 1 ग्राम भाभीरंग, 1 ग्राम पीपल का चूर्ण क्वाथ में मिलाकर पीने से कृमि नष्ट होते हैं.

5 .अनार की जड़ की छाल, पलास बीज और भाभीरंग का क्वाथ बनाकर शहद डालकर पीने से पेट के सूती, चपटे और गोल सभी प्रकार के कृमि ( कीड़े ) नष्ट होते हैं.

6 . पलास के बीजों का रस मठ्ठा में शहद डालकर पिने से सभी प्रकार के कृमि ख़त्म होते हैं.

7 .खजूर के पत्तों के बासी क्वाथ में शहद मिलकर पीने से तथा खजूर के पत्तियों का रस 40ML और शहद 40 ml मिलाकर पीने से सभी प्रकार के कृमि नष्ट होते हैं.

8 .भाभीरंग, सेंधानमक, हींग और पीपर को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर 6 ग्राम की मात्रा में मठ्ठा के साथ रात को 7 दिन तक लगातार पीने से सभी तरह के कृमि नष्ट होते हैं.

9 .मूली के पत्तों का अर्क नमक मिलाकर एक सप्ताह तक सेवन करने से उदर कृमि नष्ट होते हैं.

10 .हींग को पानी में घोलकर गुदा पर लेप करने से गुदा कृमि नष्ट होते हैं.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उदेश्य से लिखा गया है किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह जरुर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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