श्वेत प्रदर रोग होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपचार

हेल्थ डेस्क- श्वेत प्रदर का वर्णन अलग-अलग लेखकों ने अपने विचारों से अलग अलग किया है. किसी में इसका वर्णन योनि रोगों के साथ किया है तो किसी ने इसका वर्णन गर्भाशय के रोगों के साथ किया है. श्वेत प्रदर नाम से किसी विशेष व्याधि का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है. वास्तव में यह एक प्रकार का योनि व्यापद रोग है. प्राचीन दृष्टि से इसका समावेश श्लैष्मज प्रदर के वर्ग में ही किया जाता है. महर्षि चरक ने भी श्लैष्मज योनि व्यापद का वर्णन करते हुए WHITE YELLOWISH DISCHARGE का वर्णन किया है जो श्वेत प्रदर का ही बोधक है.

श्वेत प्रदर रोग होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपचार

मासिक धर्म के दौरान मिथ्या आहार विहार से, अधिक मैथुन करने से, उत्तेजक आहार सेवन करने से श्वेत प्रदर रोग की उत्पत्ति होती है. यद्यपि यह बीमारी स्वतंत्र रूप की है किंतु प्रायः अनेक स्थलों में किसी विशेष बीमारी के उपसर्ग रूप में मिलती है. इसका स्राव योनि, जरायु, भगोष्ठ आदि से रात दिन होता रहता है. यह एक प्रकार का जुकाम जैसा स्राव होता है जिसे श्वेत प्रदर रोग कहते हैं. भीतरी श्लेष्मिक झिल्ली श्वेत वर्ण की होकर बाहर आती है और यही वह स्राव है.

महिलाओं में मिलने वाली यह आम बीमारी है. इस बीमारी में गर्भाशय की श्लेष्मिक कला में सूजन उत्पन्न हो जाता है. जिसके कारण महिला की योनि से सफ़ेद, मटमैला, पीला या लाल रंग का स्राव निकलता है. यह रोग उन महिलाओं को अधिक होता है जिन्हें मासिक धर्म में गड़बड़ी रहती है. मासिक धर्म का सही नही होना एक खुद ही बहुत बड़ी बीमारी है. फिर श्वेतप्रदर या रक्त प्रदर का होना निश्चित है. किसी महिला को प्रदर रोग होने के पश्चात् मासिक धर्म की गड़बड़ी हो जाती है. और किसी को मासिक धर्म के अनियमितता के बाद प्रदर रोग हो जाता है. यह रोग बहुत ही जटिल होता है जो जल्दी ठीक नही होता है. प्रदर रोग में महिला की योनि मार्ग से हमेशा सफ़ेद या मटमैला लसदार स्राव निकलता रहता है.

श्वेतप्रदर रोग होने के क्या कारण हैं?

पुरुषों में प्रमेह रोग की तरह ही महिलाओं में यह रोग अधिकांश रूप से मिलता है. प्रदर रोग कई रोगों के परिणामस्वरुप होता है. विशेष रूप से गर्भाशय, डिम्ब ग्रंथियों, गर्भाशय मुख, गर्भाशय का अपने स्थान से हटना, योनि मार्ग की सूजन, भीतरी जननेन्द्रियों में फोड़ा- फुंसी, रसौली आदि का होना,मूत्राशय की सूजन, सूजाक , आतशक, खून की कमी, जिगर के रोग, गुर्दों के विकार, मधुमेह, मलावरोध आदि रोगों के लक्षणों के रूप में उत्पन्न होता है.

प्रदर रोग होने के कारणों में पर्याप्त सफाई का न होना, गण्डमाला, धातु रोग, चेचक आदि के उद्भेद के रोग से, गुदा मार्ग से सूत्र जैसे कीड़ा बहार निकलकर योनि मार्ग में प्रवेश करते हैं जिससे उतेजना होने पर, बचपन में धुल आदि से खेलने से धूल के योनि में जाने पर, ठंढक लगने से, बवासीर के खून बंद होने से, ज्यादा सम्भोग करने से, प्रमेह या सूजाक से ग्रसित पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इस रोग की उत्पति हो सकती है.

शारीरिक कमजोरी, जोड़ों का दर्द, छोटी उम्र में शादी हो जाना और गर्भधारण होना, बार- बार पेचिश होना, मासिक धर्म का रुकना या ज्यादा मात्रा में होना, तीब्र औषधियों को योनि में रखना, गर्भाशय कैंसर, गर्भाशय का अर्श, डिम्बाशय शोथ आदि के कारण से भी यह रोग होता है.

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खेल- खिलवाड़ में लड़कों द्वारा लड़कियों पर अत्याचार होने से प्रदाहावस्था आती है आयर चोट से भी योनि प्रदाह होता है. योनि चर्मरोग अथवा योनि में खुजली होने पर लड़कियां जब खुजलाती हैं तो योनि में गर्मी तथा सुरसुराहट पैदा होती है जिसके कारण योनि से कफ जैसा पदार्थ बहता हुआ निकलता है. यदि किसी कारण से इस स्राव में रुकावट आ जाती है तो रोग में और भी बढ़ोतरी हो जाती है. प्रथम मासिक धर्म में देरी होने पर भी इस रोग की उत्पति हो जाती है. इसके अलावा और कई कारण भी हो सकते हैं जैसे- गंडमाला, धातु रोग,लसिका या लसदार गाठों का होना, सफाई की कमी या कृमि के कारण, चोट लगना, प्रमेह दोष,कुसंसर्ग, अप्राकृतिक मैथुन, मानसिक शोक एवं गलत उपदेश आदि भी कारण हैं.

इन कारणों के अलावे थायराइड ग्लैंड और पिट्यूटरी ग्लैंड के विकार, कई विशेष कीटाणुओं और संक्रमणों के कारण भी प्रदर रोग की उत्पति होती है.

श्वेतप्रदर रोग अक्सर नवयुवतियों को होता है. उनमे गर्भाशय की श्लेष्मिक कला शोथ युक्त हो जाती है. उनमे अक्सर कष्टार्तव का लक्षण भी मिलता है.

इस रोग के कारणों में दूश भी कभी- कभी अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है. क्योंकि अधिक दूश करने से भी सामान्य योनि द्रव में बदल जाता है जिससे श्वेतप्रदर की शुरुआत हो जाती है. बार- बार गर्भपात, अधिक संतान को जन्म देना, गर्भाशय ग्रीवा में रक्त का जमा होना आदि भी इस रोग के कारण हो सकते हैं. इस रोग में मासिक धर्म के बाद अथवा बीच में स्राव की मात्रा ज्यादा होती है.

श्वेतप्रदर रोग के लक्षण क्या है?

श्वेत प्रदर रोग में महिला के गर्भाशय तथा योनि से हमेशा पानी की तरह सफेद या पीला रंग का स्राव आता रहता है जो लसदार होता है. योनि मार्ग हमेशा ही आर्द्र रहती है. इस जल युक्त स्राव का रंग कभी सफेद कभी मटमैला कभी लाल और कभी पीला रहता है. स्राव कभी ज्यादा आने लगता है तो कहीं कम हो जाता है. कभी-कभी तो इतना ज्यादा आने लगता है कि कपड़ा तर ( भींग ) हो जाता है. इससे कपड़ों में दाग पड़ जाते हैं. किसी को स्राव के कारण योनि में जलन होने लगती है और खुजली के साथ भी उसमें दुर्गंध भी आने लगती है. निचले पेट में भारीपन, चलने- उठने पर जांघ में भारीपन एवं दर्द, अवसन्नता, अरुचि, अजीर्णता, कब्ज, सिर में दर्द रहना, चक्कर आना, भूख नहीं लगना, बार-बार पेशाब करने की इच्छा होना, पेंडू में हल्का- हल्का दर्द आदि लक्षण होते हैं. यह सभी लक्षण मासिक धर्म के समय अधिक हो जाते हैं. कमजोरी होती जाती है जिससे महिला के चिडचिडी हो जाती है. यदि रोग विशेष प्रकार के कीटाणुओं के कारण होता है तो पीले रंग का झाग वाला स्राव आने लगता है. गर्भाशय के मुख एवं योनि में चने की दाल के बराबर कभी-कभी घाव हो जाते हैं.

महिला का स्वास्थ्य एवं सौंदर्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है एवं शरीर में खून की विशेष कमी हो जाती है. कभी-कभी महिला को बुखार भी आने लगता है. इस रोग की महिला को हड्फुटन एवं हाथ- पैरों में जलन होती है. कमर में दर्द रहता है वह सदैव उदास दिखाई देती है. महिला द्वारा खाया हुआ भोजन भी सही ढंग से नहीं पचता है. कुछ महिलाओं में मासिक धर्म की गड़बड़ी रहती है. अनार्तव या अल्पार्तव में भी योनि स्राव प्रचुर मात्रा में होता है.

रोग के पुराने होने पर क्रमशः कलेजे के चारों तरफ  भार और वेदना रहती है. हृतपिंड की विकृति से सांस की तकलीफ, मूर्छा भाव आदि लक्षण भी हो सकते हैं.

प्रायः शहर में रहने वाली और समृद्ध परिवारों की महिलाओं को यह रोग अधिक होता है. तीसरे से सातवें अथवा नौवें वर्ष तक और 25 से 30 वर्ष की अवस्था तक यह रोग अधिक होता है. माता को इस रोग से ग्रसित होने पर बेटी को भी इस रोग से ग्रसित होने की संभावना अधिक हो जाती है.

श्वेत प्रदर रोग की पहचान क्या है ?

इस रोग की आसानी से पहचान की जा सकती है. योनि हमेशा आर्द्र मिलती है, स्राव चौबीसों घंटे जारी रहता है. यह  स्राव दो प्रकार का होता है. पहला स्राव योनि का जो दूधिया या पीला सा पतले दही के समान होता है. यह योनि का स्राव अथवा योनि स्राव कहलाता है. दूसरा स्राव जो ग्रीवा से आता है ग्रिवीयस्राव कहलाता है. यह लसदार श्लेष्मा के समान चिपचिपा पीप् युक्त होता है.

श्वेत प्रदर रोग का परिणाम-

यह एक जीर्ण स्वरूप का रोग है और पुराना होने पर पाचन शक्ति को कमजोर करता है. महिला का शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता चला जाता है. कमर और पिंडलियों में दर्द बना रहता है. यदि रोग स्वतंत्र रूप का होता है तो प्रायः सांघातिक नहीं होता है लेकिन जब रोग किसी उपसर्ग के साथ होता है तो विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है. यह कैंसर आदि का संगठित परिणाम होता है. यह रोग अधिकांश रूप से कृच्छसाध्य होता है.

श्वेत प्रदर रोग की चिकित्सा विधि-

श्वेत प्रदर के कारणों को देखते हुए यह स्पष्ट मालूम पड़ता है कि चिकित्सा के समय हमें इन बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है.

1 .यदि यह रोग किन्हीं स्थानिक कारणों से है तो उसकी चिकित्सा स्थानिक प्रकार से करना चाहिए.

2 .यदि यह बीमारी किसी उपद्रव से, मिथ्या आहार विहार से अथवा किसी शारीरिक विकृति के कारण पैदा हुई हो तो उसकी चिकित्सा शारीरिक प्रकार से करनी चाहिए. यदि श्वेत प्रदर कोई गनोरिया आदि कृमि के कारण होता है तो उन कृमियों के निराकरण का प्रबंध करना चाहिए. यदि अर्बुद आदि के कारण हो तो उसके लिए शल्य चिकित्सा का अवलंबन करना चाहिए.

3 .श्वेत प्रदर की चिकित्सा पुरुषों के प्रमेह के समान करनी चाहिए.

4 .महिला के सामान्य स्वास्थ्य को सुधारना अति आवश्यक है.

5 .महिला को संपूर्ण चिंताओं से मुक्त कराना चाहिए.

श्वेत प्रदर का सहायक चिकित्सा-

1 .महिला को प्रतिदिन सुबह-शाम खुली एवं स्वच्छ वायु में टहलना चाहिए. इसका शरीर पर बेहतर प्रभाव पड़ता है.

2 .हल्का व्यायाम तथा कपड़े धोना, चरखा चलाना, घर साफ करना तथा खाना बनाना आदि करनी चाहिए. सुबह के समय चक्की चलाना सबसे उत्तम है.

श्वेत प्रदर रोग की आयुर्वेदिक चिकित्सा-

1 .आधुनिक चिकित्सा की तरह की आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी श्वेत प्रदर के कारणों को पहले दूर करने पर जोर दिया गया है. इसके बाद स्थानिक चिकित्सा के निमित्त स्थानिक शोधन की भी पूर्ण व्यवस्था करनी चाहिए. इसके लिए उदुम्बर के पत्र या त्वक के कसाय या उदुम्बर सत्व का जल में विलय बनाकर उसके द्वारा योनि का प्रक्षालन कराना चाहिए.

2 .उदुम्बरादि तेल- गूलर के सूखे फल कूटे हुए 2 किलो तथा बड्गुलर, पीपल, पिलखन, बेंत की छाल, पटोल, नीम, चमेली के पत्ते सब मिलाकर 2 किलो. इस 4 किलो सामान को कुल 4 लीटर पानी में रात्रि को भिगो दें. इस जल को छानकर उसमें 1 किलो तेल तथा थोड़ी लाक्षा सेनल की गोंद और खैर की लकड़ी का कल्क मिलाकर तेल साधन करें. इस तेल के भरे पिचू को योनि में रखवायें. अथवा पिप्पल्यादि वर्ती- पीपल, उड़द, सौंफ, सेंधा नमक इनकी बनी वर्ती योनि में रखवाएं.

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3 .त्रिफला के जल से या नीम, धव, जामुन आदि के छालों के साथ में थोड़ा सिरका मिलाकर उसकी उत्तरबस्ती दें. 4 .योनि प्रक्षालन के लिए निम्न वर्ग विशेष उपयोगी है. मौलश्री की छाल 60 ग्राम 1 लीटर पानी में मिलाकर आग पर पकावें और मोटे वस्त्र से छानकर 3 ग्राम फिटकरी मिलाकर घुल जाने पर पिचकारी से योनि का प्रक्षालन करें.

5 .अशोक घृत का फाया प्रक्षालन के पश्चात अच्छी तरह जल को सुखाकर योनि के अंदर रखें. इससे स्राव बंद हो जाता है.

6 .माजूफल को 7 ग्राम लेकर आधा लीटर पानी में पकावें और मोटे वस्त्र से छान लें. तत्पश्चात उसमें 3 ग्राम सुहागे की खील मिलाकर पिचकारी से योनि तथा उसके भीतरी अंगों का प्रक्षालन करें.

7 .उपर्युक्त स्थानिक चिकित्सा के साथ-साथ रोगी के निमित्त बलवर्धक लौह चूर्ण, घृत और मांस विटामिन ए और विटामिन डी से युक्त आहारों की स्नेहन के लिए व्यवस्था करनी चाहिए जो आंतरिक चिकित्सा के अंतर्गत भी आता है.

8 .विधारा 12 ग्राम, लोध्र 12 ग्राम समुद्रशोष 12 ग्राम, मिश्री 12 ग्राम सबको कूट पीसकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें अब इसमें से 6 से 12 ग्राम तक पानी के साथ सेवन करने से श्वेत प्रदर रोग कुछ ही दिनों में दूर हो जाता है.

9 .वंग भस्म, नाग भस्म, यशद भस्म, लौह भस्म, प्रवाल पिष्टी, गुरुची आदि का घी और शक्कर के साथ सेवन कराना फायदेमंद होता है.

10 .चवनप्राश का दूध के साथ सेवन, भोजन के बाद पत्रांगासव या लोध्रासव का सेवन करावें, साथ ही महिला को दूध में घी डालकर पिलावें.

11 .स्वर्ण बंग 1 ग्राम, कुक्कुटांड़त्वक भस्म 1 ग्राम, आंवला का चूर्ण 12 ग्राम, बंग भस्म 12 ग्राम, हल्दी का चूर्ण 12 ग्राम सबको मिलाकर 10 पुड़िया बना लें. अब इसमें से एक- एक पुड़िया सुबह- शाम मधु के साथ सेवन कराने से श्वेत प्रदर रोग में अच्छा लाभ होता है. इसके साथ ही 12 ग्राम सुपारी पाक और 20 मिलीलीटर अशोकारिष्ट पीना अधिक लाभदायक होता है.

13 .आम के फूल, सुपारी के फूल, पिस्ता के फूल, बड़ी नाई, पलास का गोंद तथा छोटा गोखरू सभी को 12-12 ग्राम लेकर इसमें 18 ग्राम इमली का बीज और 9 ग्राम बकायन तथा 6 ग्राम सफेद चंदन एवं मीठा इंद्रजौ 9 ग्राम, सफेद मुसली 12 ग्राम, हरे माजू 12 ग्राम, अनार के फूल 12 ग्राम. सबको पीसकर चूर्ण बना लें. अब इसमें 6 ग्राम बंग भस्म तथा सभी के बराबर मिश्री का पाउडर मिलाकर सुरक्षित रख लें. अब इसमें से 10 ग्राम को आधा लीटर गाय के दूध के साथ प्रतिदिन सेवन कराने से श्वेत प्रदर कुछ ही दिनों में जड़ से खत्म हो जाता है.

14 .समुद्रशोष और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें. अब इसमें से 12 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पुराने से पुराना श्वेत प्रदर रोग दूर होता है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह जरूर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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