श्वसनीविस्फार ( ब्रोंकाइटिस ) होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार

हेल्थ डेस्क- श्वसनीविस्फार को वायु प्रणाली विस्तृति, श्वासनली- शैथिल्य, जीर्णपूय, कास और अंग्रेज़ी में ब्रोंकाइटिस आदि नामों से जाना जाता है.

यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें श्वास नली की अस्थाई स्थिति हो जाती है.

श्वसनीविस्फार ( ब्रोंकाइटिस ) होने के कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपचार

ब्रोंकाइटिस होने के कारण क्या है ?

इस रोग को उत्पन्न करने के लिए तीन बातों का होना आवश्यक होता है.

1 .वायु प्रणाली की दीवार का कमजोर होना- इलास्टिक टिशू में लचक नष्ट हो जाती है. जिसके कारण वायु प्रणाली फ़ैलकर पुनः अपनी स्थिति में नहीं आ पाती है.

2 .कई व्यक्तियों में जन्म से ही वायु प्रणालियों में इलास्टिक टिशू दुर्बल होते हैं. इन व्यक्तियों में इसके होने की अधिक संभावना होती है.

3 .वायु प्रणालियों पर लगातार दबाव पड़ना जैसे- पुरानी खांसी एवं श्वास रोगों के कारण.

विकृति- फेफड़ों के जिस भाग में वायु प्रणालियों की विस्तृति होती है वह भाग संकुचित हो जाता है.

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संक्षेप में इसके कारणों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है.

1 .सहज कारण-

फेफड़ों के किसी भाग का संकुचित होना फेफड़ों में जन्म से सिस्ट का होना फेफड़ों में इलास्टिक टिशू का अभाव या निर्बल अथवा कम होना.

2 .जन्मोतर कारण-

वायु प्रणालियों में रुकावट, किसी वस्तु का अटक जाना या मार्ग का संकुचित होना, जीर्ण शोथ के कारण वायु प्रणाली का दब जाना अथवा निकट स्थित अर्बुद आदि के दबाव के कारण, लंबे समय तक जोर से सांस लेने से वायु प्रणालियों की दीवार कमजोर हो जाता है जैसा कि यक्ष्मा तथा श्वास रोग में होता है.

रोगों के उपद्रव स्वरूप रोग की उत्पत्ति-

यह रोग बाल्यावस्था में हुए खसरे, काली खांसी के पश्चात उपद्रव स्वरूप होता है अथवा ब्रोंको- निमोनिया के हो जाने पर उसके पूरी तरह से ठीक ना होने एवं क्रॉनिक रूप में रह जाने से यह रूप प्रारंभ होता है. लेकिन बाद में 30- 40 वर्ष की आयु में फिर से प्रगट हो जाता है. श्वास नलिकाओं का चिरस्थायी जीवाणु संक्रमण इस रोग का प्रधान कारण माना जाता है. शुष्क यक्ष्मा के होने पर श्वास नालियां चौड़ी हो जाती है और उनमें से समय-समय पर बड़ी मात्रा में पीप की तरह बलगम निकलता है. चिरस्थायी खांसी तथा संक्रमण के कारण श्वास नलिकाओं की प्राचीर कमजोर हो जाती है. इन दोनों कारणों के मौजूद होने से अथवा इनका पुनराक्रमण होते रहने पर श्वास नलिका की विकृति धीरे-धीरे बढ़ती जाती है इस वृद्धि के कारण एक प्रकार की कैविटी बन जाती है.

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ब्रोंकाइटिस रोग के लक्षण क्या है ?

1 .श्लेष्मा युक्त खांसी- यह इस रोग का मुख्य लक्षण है. बहुत वर्षों तक खांसी के अतिरिक्त अन्य कोई लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. बाद में किसी एक करवट में लेटने के पश्चात उठने पर अथवा करवट बदलने पर अथवा हल्की नींद में हो तो खांसी आरंभ हो जाती है और बहुत श्लेष्मा ( कफ ) निकलने लगता है. प्रातः उठने पर खांसी के प्रायः ऐसे वेग आते हैं. श्लेष्मा कोपियस के रूप में एवं पीपयुक्त होता है.

खांसी के साथ समय- समय पर अधिक मात्रा में दुर्गंधित कफ निकलता है. रोगी को जगह बदलने या सिर निचा करने से खांसी का दौरा कम हो जाता है.

2 .खून की उल्टी- कभी- कभी खांसी के साथ खून भी आता है. इसमें बलगम के साथ थोड़ी मात्रा में खून आता है.

3 .पार्श्वशूल- यह लक्षण बार- बार उत्पन्न होता है. जो सुखा प्लूरिसी एवं न्युमोनिया में होता है.

4 .फेब्राइल एपिसोड्स- यह समय- समय पर ब्रोंकिएक्टेटिक कैविटी के द्वितीयक संक्रमण द्वारा होता है. कुछ दिन या सप्ताह के बाद शीत एवं कपकपीं के साथ बुखार आता है. यह बुखार पसीने के साथ उतर जाता है. ऐसी स्थिति में मलेरिया रोग का संदेह होता है. यदि ऐसे बुखार का वेग तीब्र और बार- बार होने लगे तो समझना चाहिए कि रोग ने उग्र रूप धारण कर लिया है.ऐसी स्थिति में चिकित्सा के अभाव में बलगम को न निकालने तथा संक्रमण को न रोकने से सेप्टिक ब्रोंको- न्युमोनिया हो जाता है. अथवा दक्षिण ह्रदय पर उसके ऊपर भार पड़ने से हार्ट- फेल भी होने की संभावना रहती है.

5 .क्रोनिक साइनूसाइटिस- यह लगभग 70% रोगियों में मौजूद रहता है.

6 .ब्रीदलेसनेस- यह प्रायः न्यूमोनिया के द्वारा होता है. या फिर क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के द्वारा होता है.

7 .सामान्य लक्षण- मैलाइस तथा भार में कमी आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं. रोगी की अंगुलियाँ मुदगरवत हो जाती है.

अन्य निदानात्मक लक्षण एवं चिन्ह-

  • अंगुलियों के सिरे मोटे दिखलाई पड़ते हैं यह लक्षण 50% रोगियों में मिलता है.
  • पल्मोनरी ओस्टियोआर्थ्रोपैथी बढ़ी हुई मिलती है.
  • छाती किसी एक तरफ के फेफड़े की निम्न भाग के संकुचित हो जाने से उस तरफ की छाती की दीवार कुछ दबी हुई तथा श्वास- प्रश्वास के साथ कुछ कम हिलती दिखलाई देती है.

निदान की दृष्टि से रोग के निम्न प्रधान लक्षणों का मिलना महत्वपूर्ण प्रमाण है.

  • आसन परिवर्तन से खांसी में बढ़ोतरी होना.
  • विशेषकर सुबह के समय अधिक मात्रा में दुर्गंधित कफ का निकलना.
  • फेफड़ों में फाइब्रोसिस तथा कैविटी के चिन्हों का मिलना.
  • बलगम का तीन परतों वाला होना.

सामान्य प्रबंध एवं चिकित्सा-

  • ब्रोंकाइटिस से बचने के लिए फेफड़ों के संक्रमण तथा खांसी की तत्परता के साथ चिकित्सा करनी चाहिए. क्योंकि यह रोग ब्रोंको- निमोनिया के उपद्रव स्वरूप होता है. अतः जब किसी बालक को यह रोग हो तो उसकी चिकित्सा में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए.
  • श्वसन संस्थान के अन्य रोगों से बचने के लिए अन्य उपायों का सहयोग लेना चाहिए.
  • रोगी की चिकित्सा के साथ-साथ नासिका एवं गले आदि में शोथ का प्रतिकार करते रहना चाहिए. उसके होने पर उसकी तत्काल चिकित्सा करनी चाहिए.
  • शुष्क और गर्म वातावरण में निवास तथा धुएं और धूल से यथासंभव बचाकर रखना चाहिए.
  • जब- जब रोग थोड़ा बढ़ जाए तो लेट ( सो ) जाना चाहिए. साथ ही चारपाई के पैर वाले भाग को आधा से 1 फुट ऊंचा रखना चाहिए.
  • पौष्टिक आहार तथा शुद्ध वायु से शरीर का पोषण बढ़ाना चाहिए.
  • रोगी के स्वास्थ्य की वृद्धि उपसर्ग की विशिष्ट चिकित्सा तथा कैविटी को स्राव रहित रखने का यत्न करना चाहिए.
  • भोजन में प्रोटीन की अधिकता होनी चाहिए.
  • शय्या ( बेड ) पर प्रतिदिन भोजन उपरांत दो बार रोगी का सिर नीचा करके लिटाने से कैविटी में संचित हुआ स्राव निकल जाता है.
  • धूम्रपान, सिगरेट आदि को बिल्कुल ही बंद कर देना चाहिए.
  • गरम पेय देने से बलगम निकालने में आसानी होती है.
  • दमा आदि होने पर उसकी उपयुक्त चिकित्सा करनी चाहिए.
  • चारपाई पर एक करवट लेटकर दोनों हाथों को नीचे फर्श पर रखें. तकिए पर लिटाकर सिर को नीचा करके रोग ग्रस्त फेफड़ों के निम्न खंड को अपेक्षाकृत ऊंचा करके अंदर एकत्रित बलगम को नीचे रखे बर्तन में निकाल देना चाहिए. ऐसा 15 से 30 मिनट तक करना चाहिए. इस क्रिया को करने से पूरा बलगम बाहर निकल जाता है. इस प्रकार सुबह- शाम दिन में दो बार बलगम को साफ करना चाहिए.

ब्रोंकाइटिस की आयुर्वेदिक चिकित्सा-

1 .तालीसादि चूर्ण 1 ग्राम, लवंगादि चूर्ण 1 ग्राम, श्रृंग भस्म आधा ग्राम और श्वास कुठार वटी दो वटी पानी से सेवन कराएं.

2 .कफपानक 20 मिलीलीटर, कनकासव या दशमूलारिष्ट 20 मिलीलीटर को उतने ही पानी में और भागोतर वटी दो-दो गोली दिन में तीन बार सेवन कराएं.

3 .पुटपाक हरड़ या मुलेठी या सौंफ या लवंगादि वटी मुंह में रखकर चूसने को दें. इससे कफ ढीला होकर निकलेगा.

4 .छाती के ऊपर पानी या नमक का सेक करें.

5 .बच्चों को हो तो कमरे को उबलते हुए पानी से गर्म रखें.

6 .श्रंग्यादि चूर्ण, सितोपलादि चूर्ण 1- 1 ग्राम दिन में तीन- चार बार सेवन कराएं.

7 .च्यवनप्राश अवलेह 5 ग्राम सुबह- शाम सेवन कराएं.

8 .रोगी को ठंडी हवा, पानी और शीत से बचाएं.

खांसने से पीला और कड़वा का कफ निकले, छाती में दाह, मुख सुखा हो, आंखें आदि कुछ पीली सी लगे, कभी कभी कफ के साथ थोड़ा खून आवे. यकृत विकृति से भी पित्तज कास ( खांसी ) होता है ऐसी स्थिति में-

9 .प्रवालादि चूर्ण 1 ग्राम, सितोपदि चूर्ण 1 ग्राम और गोदनी भस्म आधा ग्राम दिन में 3 बार पानी के साथ सेवन कराएं और द्राक्षासव या अर्जुनारिष्ट 20 मिलीलीटर दिन में तीन बार सेवन कराएं और च्यवनप्राश अवलेह 10 ग्राम रात को दूध के साथ सेवन कराएं.

10 .वासारिष्ट, वासावलेह, प्रवाल भस्म, अभ्रक भस्म, भागोतर बटी का सेवन कराना उत्तम है.

ब्रोंकाइटिस का घरेलू उपचार-

1 .अदरक-

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अदरक में प्रभावी एंटीवायरल के गुण मौजूद होते हैं जो आप सर्दी में और साथ ही साथ ब्रोंकाइटिस के उपचार के लिए भी उपयोग में ला सकते हैं. इस में सूजनरोधी और प्रतिरक्षा प्रणाली गुण भी मौजूद होते हैं जो ब्रोंकियल ट्यूब में होने वाली सूजन और जलन को रोकने में मदद करते हैं. इसके लिए एक कप गर्म पानी में थोड़ा अदरक, एक चम्मच दालचीनी और 1-2 लौंग मिलाएं. अब इस मिश्रण को अच्छे से उबालें और चाय की तरह सेवन करें. इससे ब्रोंकाइटिस की परेशानी से आपको काफी आराम मिलेगा. इसका इस्तेमाल कुछ दिनों तक लगातार करें.

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2 .लहसुन-

लहसुन में एंटीबायोटिक और एंटीवायरल गुण मौजूद होते हैं जो ब्रोंकाइटिस के इलाज के लिए काफी लाभदायक साबित हो सकते हैं. विशेष रूप से यह घातक ब्रोंकाइटिस के लिए लाभदायक है. इसके लिए सबसे पहले तीन लहसुन की कलियों को छिल करके और काट लें. अब लहसुन को दूध में डालकर उबालें और पी जाएं. इस मिश्रण का इस्तेमाल प्रतिदिन रात को सोने से पहले करें.

3 .नीलगिरी का तेल-

स्टीम थेरेपी यानी भाप लेना ब्रोंकाइटिस के रोगियों के लिए काफी लाभदायक होता है. इसके लिए नीलगिरी का तेल इस्तेमाल करें. इससे जमा बलगम कम होगा, इसमें जीवाणु विरोधी और ब्रोंकाइटिस की समस्या को रोकने की ताकत होती है. इसके लिए गर्म पानी में नीलगिरी के तेल की कुछ बूंदों को मिलाएं और इस मिश्रण की मदद से भाप थेरेपी का इस्तेमाल करें. भाप लेते समय तौलिए से अपने सिर को ढक लें. अगर नीलगिरी का तेल आपके पास मौजूद ना हो तो आप पाइन तेल या टी ट्री आयल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा नीलगिरी के तेल को छाती पर भी मसाज किया जाता है. इसकी मदद से आप को बलगम को निकालने में आसानी होती है और श्वसन प्रणाली के कार्य में भी इसी तरह की रुकावट उत्पन्न नहीं होती है.

4 .शहद-

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शहद कई रोगों को दूर करने की शक्ति रखने वाली चीज है. यह ब्रोंकाइटिस से होने वाली खांसी के लिए भी काफी लाभदायक है. शहद में मौजूद एंटीवायरल और जीवाणु विरोध ही गुण होते हैं जो गले के लिए काफी फायदेमंद होते हैं. इसके अलावा शहद के सेवन से इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है. इसके लिए अपने नियमित चाय में एक चम्मच शहद मिलाने से आपको ब्रोंकाइटिस से होने वाली खांसी में राहत मिलेगा. इसके अलावा आप नींबू पानी में शहद को मिलाकर भी पी सकते हैं. इसकी मदद से आपको गले में होने वाली सूजन से छुटकारा मिलेगी.

5 .हल्दी-

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हल्दी के सूजन रोधी गुण ब्रोंकाइटिस से जुड़े खांसी के इलाज के लिए काफी फायदेमंद होते हैं. ब्रोंकाइटिस से छुटकारा पाने के लिए हल्दी का उपयोग जरूर करें. इसके सेवन से ब्रोंकाइटिस की समस्या से जल्द ही छुटकारा मिलेगी. इसके लिए एक गिलास दूध में एक चम्मच हल्दी का पाउडर मिलाएं. फिर उसे उबालें उबालने के बाद इसे आंच से उतारकर हल्का ठंडा कर लें. जब पीने लायक ठंडा हो जाए तो पिएं. ऐसा दिन में दो- तीन बार जरूर करें. इसके अच्छे परिणाम के लिए खाली पेट भी पी सकते हैं.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है. किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह जरूर लें. क्योंकि किसी भी बीमारी की चिकित्सा चिकित्सक की देखरेख में होने से अच्छा परिणाम मिलेगा. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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