जानें- स्वास्थ्य रक्षा की सरल विधियां क्या है ?

हेल्थ डेस्क- मनुष्य मात्र का सर्वप्रथम कर्तव्य स्वास्थ्य रक्षा है क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति संभव है. निरोग शरीर में उपयुक्त बल और कांति के साथ पूर्ण आयु का उपयोग करना ही स्वास्थ्य है. स्वास्थ्य को सुनिश्चित रखने के लिए प्रत्येक मनुष्य को दो बातों पर ध्यान रखना चाहिए.

जानें- स्वास्थ्य रक्षा की सरल विधियां क्या है ?

1 .स्वास्थ्य के नियमों का पालन.

2 .रोग होने पर उपयुक्त चिकित्सा.

नियमों को भंग करके संयम से हटकर जो लोग यथेच्छाचार करते हैं वही तरह- तरह के रोगों से आक्रांत होते हैं. आहार-विहार, व्यायाम, निद्रा आदि के नियमों का पालन करना चाहिए. फिर भी यदि किसी त्रुटि के कारण नियमों का पालन ना हो सके और शरीर का बल कम हो जाए, खाद्य के सार भाग के ग्रहण की शक्ति कम हो जाए तो अभिलंब उपयुक्त औषधि सेवन से स्वास्थ्य को ठीक कर लेना चाहिए.

जैसे ही कोई रोग शरीर में प्रवेश करें उसी समय नष्ट करके उचित रीति से औषधि का सेवन करना बुद्धिमानों का कर्तव्य है क्योंकि रोग जब तक नया रहता है तब तक उस पर औषधि का शीघ्र प्रभाव पड़ता है और अल्प प्रयास तथा कम व्यय से ही स्वास्थ्य का सुधार हो जाता है.

स्वास्थ्य की रक्षा का मुख्य उपाय है उपयुक्त आहार- आहार शरीर की अवस्था, गठन और बल के अनुसार रहना चाहिए. जिस ऋतु में, जिस अवस्था में, जिन खाद्य पदार्थों के ग्रहण से पाचन तंत्र को कोई कष्ट ना हो, खाया हुआ पदार्थ शीघ्र ही पच जाए, अजीर्ण न उत्पन्न हो वहीं खाद्य ग्रहण करना चाहिए.

खाद्य के परिणाम और खाद्य के चुनाव का साधारण नियम सबके लिए एक है. लेकिन बल और अवस्था के अनुसार इस विषय में तारतम्य होता ही है. जो भी पदार्थ खाया जाए वही हजम होना चाहिए. क्योंकि हजम होने से ही रस और अन्य सभी धातुओं की परिपुष्टि होती है. केवल बलपूर्वक अधिकाधिक खाद्य खाने से अथवा उत्तमोत्तम पदार्थ खाने से ही लाभ नहीं होता है. शरीर को लाभ तभी होता है जब की पाचन तंत्र उसे शीघ्र पचा सके, साथ ही खाया हुआ पदार्थ जब पच जाता है तो भूख लगती है. भूख लगने पर खाद्य ग्रहण करना चाहिए. खाद्य ठीक समय पर ना मिलने पर भी स्वास्थ्य गिरने लगता है. अतः क्षुधा की निवृति होनी ही चाहिए. भूख लगने पर यदि भोजन ना मिलेगा तो शरीर कमजोर होने लगेगा और रोग का आक्रमण होगा. असमय में मृत्यु हो जाएगी.

उपयुक्त आहार ठीक समय पर मिलना चाहिए, किंतु अति भोजन स्वास्थ्य का नाश करता है. इस बात को सदा ध्यान में रखना चाहिए. आहार स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ही है. मानव स्वस्थ रहने पर ही समाज का कल्याण कर सकता है. निरोग रहने से ही मानव की सेवा की जा सकती है. अतः शरीर की रक्षा करना ही मानव का मुख्य कर्तव्य है, लेकिन अपने शरीर की रक्षा के लिए किसी अन्य को कष्ट न देना चाहिए. हमारे पूर्वज ऋषि- मुनियों का यही उपदेश है. वह स्पष्ट शब्दों में घोषित कर गए हैं कि परोपकार ही पुण्य है. परपीड़न ही पाप है. पाप से भी स्वास्थ्य हानि होती है. अतः पाप से अर्थात परपीड़न से विरत ( दूर ) रहना चाहिए.

स्वस्थ रहने के लिए कैसा भोजन करना चाहिए ?

भोजन के संबंध में नियमों का पालन अति आवश्यक है. जल पीकर तुरंत ही भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि जल पीकर तुरंत भोजन करने से शरीर की कृशता बढती है और अग्निमांद्य उपस्थित होता है. भोजन के बीच में किंचित ( हल्का ) जल पीने से अग्नि प्रदीप्त होती है. भोजन उपरांत ही जल पीने से स्थूलता ( मोटापा ) बढ़ती है. कफ बढ़ता है. प्यास लगे तो जल पीना चाहिए. भूख लगे तो भोजन करना चाहिए. प्यास से छटपटाने वाला भोजन करें और भूख के छटपटाने वाला जल पीकर पेट भर ले तो स्वास्थ्य को अवश्य ही हानि पहुंचेगी. क्योंकि प्यासा भोजन कर ले और भूखा पानी पी ले तो जलोदर रोग ( पेट में पानी भरना ) का आक्रमण हो सकता है. मधुर रस भोजन करने से वायु और पित्त का शमन होता है. लवण अम्ल रस युक्त चीजें खाने से कफ नष्ट होता है. अल्पाहार से अथवा अन्नाहार से शरीर क्षीण और दुर्बल हो जाता है, साथ ही गुरु आहार से अर्थात अति भोजन से अनिष्ट होता है. गुरु शब्द का अर्थ है भारी. यह भारी तीन प्रकार से उपस्थित होता है तीनों ही स्वास्थ्य नाशक है. इसका परिचय इस प्रकार है.

मात्रा गुरु उसे कहते हैं जो उचित परिमाण से ज्यादा हो, जैसे एक छटांक के बदले कोई एक पाव घी खा जाए तो वह मात्रा गुरु कहलायेगा. उदाहरण स्वरूप जूस, माड़, दूध आदि घी की तरह गुरु नहीं है लेकिन परिमाण में अधिकता होने से यह भी शुरू हो जाएंगे. कुछ चीजें स्वभाव से ही गुरु हैं अर्थात वे स्वभावतः गरु ही है जैसे- मांस, उड़द आदि. स्वभाव से गुरु पदार्थों के अलावा कुछ खाद्य पदार्थ संस्कार गुरु हैं अर्थात बहुत सामग्री से पकए जाने के कारण वे गुरुत्व प्राप्त करते हैं. जो पदार्थ गुरु हैं स्वभावत्या संस्कार बस उनको अर्धतृप्ति तक खाना चाहिए. और जो पदार्थ लघु है उनको पूर्ण तृप्ति तक खाना चाहिए.

भोजन के समय का ध्यान रखना आवश्यक है. उचित समय पर किया गया भोजन बल और आयु को बढ़ाता है. और उसके विपरीत अकाल भोजन स्वास्थ्य नाशक होता है. सामान्यतः दो समय भोजन करना उचित है. इसके अतिरिक्त एक समय अल्पाहार किया जा सकता है. कहा भी गया है कि एक बार योगी, दो बार भोगी और बार-बार रोगी अर्थात जोगी को एक बार और गृहस्थ को 2 बार भोजन करना चाहिए. बार- बार भोजन करने से रोग होता है. यही बात शौच के संबंध में भी समझनी चाहिए. केवल रोगी ही बार-बार शौच के लिए बाध्य होता है. एक बार के भोजन के बिना पचे ही दूसरी बार भोजन कर लेने को अध्ययन कहते हैं. इससे आपका पेट भारी होना, खट्टी डकार आदि लक्षण होते हैं. सामान्यतः आहार 3 घंटे में अमाशय से निकलकर आंतों में चला जाता है. गुरु आहार में चार-पांच घंटे लग सकते हैं. अतः 3 घंटे के अंदर भोजन ना करना चाहिए और 6 घंटे से अधिक समय तक भूखा नहीं रहना चाहिए. कहा भी है-

याम मध्ये न भोक्तव्यं याम युग्मं न लंघयेत !

याम  मध्ये  रसोद्वेगः युग्मेतीते  बल  क्षयः !!

अर्थात एक याम यानी 3 घंटे के अंदर भोजन नहीं करना चाहिए और 2 याम यानि 6 घंटे से अधिक भूखा नहीं रहना चाहिए. क्योंकि एक याम के अंदर भोजन कर लेने से पाचक रसों का उद्योग होता है और 2 याम बीत जाने पर बल ( शक्ति ) का नाश होता है. यह उक्ति आधुनिक विज्ञान सम्मत भी है.

इससे यह भी समझना चाहिए कि दिन की प्रथम पहर में आहार नहीं करना चाहिए. परंतु प्रथम पहर बीत जाने पर दूसरे पहर के अंदर (12:00 बजे के अंदर ) अवश्य ही भोजन कर लेना चाहिए. आजकल बेड टी की प्रथा बढ़ रही है यह उष: पान का स्थान कदापि नहीं ले सकती है. इससे आमाशय में अम्लोत्कर्ष होता है.

दो शब्द प्रातः काल धारोष्ण दुग्ध के संबंध में भी कहना आवश्यक है. धारोष्ण दुग्ध अपने घर की स्वस्थ गाय का ही अच्छा होता है. उसे भी स्तनों को स्वच्छ कर स्वच्छ पात्र में ग्रहण करना चाहिए. गाय की स्वच्छता में तनिक भी संदेह हो तो कच्चा दूध नहीं पीना ही अच्छा है, अन्यथा रोग के जीवाणु पेट में जाकर रोग उत्पन्न करते हैं. उबालने से यह रोगाणु नष्ट हो जाते हैं.

स्वस्थ रहने के लिए  व्यायाम करना-

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स्वास्थ्य रक्षा के लिए जिस तरह उपयुक्त आहार की आवश्यकता है. उसी तरह उपयुक्त व्यायाम की भी आवश्यकता होती है. जिस तरह उचित परिमाण में अधिक आहार हानिकारक है उसी तरह अत्यधिक व्यायाम भी हानिकारक है. जैसे सब के लिए एक ही प्रकार का आहार लाभदायक नहीं हो सकता, उसी प्रकार सबके लिए एक ही प्रकार का व्यायाम भी लाभदायक नहीं हो सकता एवं उपयुक्त व्यायाम पर भी ध्यान देना चाहिए. उचित व्यायाम से ही स्वस्थ की रक्षा संभव है. अनुचित व्यायाम से नहीं. जिस तरह लोहे का बना हुआ कोई भी औजार या यंत्र काम में ना लाए जाने से जंग पकड़ लेता है उसी तरह शरीर को भी निष्क्रिय रखने से व्यायाम के बिना रखने से वह निकम्मा हो जाता है. कल पुर्जों को सर्वदा चालू अवस्था में ना रखने से मोर्चा लगता है और भी शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं. फिर नियम से अधिक चलाते रहने पर भी वे जल्दी घिस जाते हैं. ठीक उसी तरह शरीर यंत्र को भी परिश्रम द्वारा उत्तेजित ना रखने के क्रम से कमजोर हो जाते हैं और अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक श्रम से भी ध्वस्त हो जाते हैं. इसी कारण जो लोग परिश्रम नहीं करते उनके शरीर में तरह- तरह के रोग उत्पन्न होते हैं और घोर परिश्रम के कारण वलिष्ठ व्यायाम- वीरों की भी कम उम्र में मृत्यु हो जाती है.

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व्यायाम का उद्देश्य है कि हृदपिंड- क्रिया की रक्षा हो और उसकी वृद्धि हो. शारीरिक परिश्रम से हृदपिंड के रक्त की गति तेज होती है और रक्त की तेज गति के साथ श्वास- प्रश्वास का वेग भी बढ़ जाता है. जिस परिमाण में विशुद्ध वायु का प्रवेश फेफड़े में होना चाहिए, उतनी वायु एक स्थान पर निश्चित बैठे रहने से प्रवेश नहीं कर सकती, अतः फेफड़े के कार्य में बाधा पड़ने से रोग उत्पन्न होता है.

व्यायाम अनेक प्रकार के हैं- दौड़ना, घोड़े पर चढ़ना, नाव खेवना, कुश्ती आदि कितने ही व्यायाम होते हैं. किंतु इन सभी में भ्रमण ( टहलना ) ही सबसे सहज और अधिक फलप्रद है. प्रातः काल भ्रमण करने से मन प्रफुल्लित होता है. हृदपिंड क्रिया बढ़ती है और समूचे अंग की मांसपेशियों की वृद्धि होती है. प्रतिदिन प्रातः काल और संध्या को कम से कम 4 मील टहलने से किसी दूसरे व्यायाम की जरूरत नहीं पड़ती है. व्यायाम इतना होना चाहिए कि सांस ना फूलने लगे, थोड़ा पसीना आवे और अत्यधिक थकावट मालूम ना हो.

महिलाओं के लिए व्यायाम-

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प्रत्येक महिलाओं के लिए व्यायाम करना उतना ही आवश्यक है जितना भोजन करना, श्रृंगार करना, स्नान करना, सुंदर वस्त्र धारण करना व्यायाम से शरीर हल्का होता है. चेहरे पर सुंदरता आती है. शरीर सुगठित होता है. कार्य करने में उत्साह बढ़ता है. जठराग्नि में वृद्धि होती है. स्वास्थ्य ठीक रहता है.

गृहस्थ महिलाओं के लिए चरखा कातना, चक्की चलाना, कुआं से जल भरना आदि अच्छे व्यायाम हैं जो महिलाएं घरों से बाहर नहीं निकलती वे घरों के अंदर झाड़ू लगाना, चरखा चलाना, सिलाई- बुनाई आदि काम कर सकती हैं. ग्रामीण महिलाओं प्रायः शारीरिक परिश्रम करती ही है अतः उनका व्यायाम हो ही जाता है और इस कारण वे नगरों की महिलाओं की अपेक्षा अधिक स्वस्थ ही रहती हैं. जिन महिलाओं की ऐसी शारीरिक परिश्रम करने की स्थिति नहीं है उनको कोई न कोई व्यायाम तो करना ही चाहिए. निश्चेष्ट बैठकर केवल पुस्तकें पढ़ने से स्वास्थ्य ठीक नहीं रह सकता, अतः यथोक्त उच्च श्रेणी की महिलाओं को भी टहलना अथवा किसी भी प्रकार का व्यायाम अपना ही लेना चाहिए क्योंकि व्यायाम स्त्री-पुरुष सभी के लिए परम आवश्यक है.

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निद्रा ( नींद )- स्वस्थ रहने के लिए कितना सोना चाहिए ?

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शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के परिश्रम के बाद नींद की आवश्यकता पड़ती है. शारीरिक या मानसिक परिश्रम के कारण स्नायु मंडल उत्तेजित होता है और समूचे शरीर की मांसपेशियां भी उत्तेजित हो जाती है. इस उत्तेजना के अवसान के बाद शारीरिक क्रांति और मानसिक अवसाद उत्पन्न होता है. इस अवसन्नता को दूर करने के लिए नींद की जरूरत पड़ती है. पूरी मात्रा में नींद ना आने से वायुमंडल की दुर्बलता, चंचलता, भूख की कमी, परिपाक ह्वास और कृशता पैदा होती है. अधिक नींद से भी हानि होती है अधिक निद्रा से अवसाद, शारीरिक जड़ता, देह यंत्रों में शिथिलता उत्पन्न होती है. युवकों और साधारण श्रमशील व्यक्तियों को कम से कम 6-7 घंटे सोना चाहिए. अति परिश्रमी व्यक्तियों को 8 घंटे और बच्चों को 10- 12 घंटे सोना चाहिए. विशेष कोई विघ्न उपस्थित न होने पर साधारण स्वस्थ व्यक्ति को 10:00 बजे रात को सो जाना चाहिए और सवेरे 5:00 बजे शय्या ( बेड ) त्याग देना चाहिए.

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रोगों के आक्रमण से बचने के लिए शरीर के उपायदानों की साधारण जानकारी अवश्य रहनी चाहिए. अतः यहां उनका परिचय मात्र दिया जाता है.

जो खाद्य हम खाते हैं वह पाकस्थली में जाकर हजम हो जाता है. उसके कारण सफेद जलीय जो सार भाग उत्पन्न होता है उसका ही नाम रस धातु है. यह रस धातु यकृत में जाता है. वहां रंजक पित्त के द्वारा वह लाल रंग प्राप्त करके रक्त में परिणत हो जाता है. इस प्रकार स्वाभाविक परिणति होते रहने से मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र तैयार हो जाता है और हमारा शरीर स्वस्थ रहता है.

स्रोत- आयुर्वेद ज्ञान गंगा पुस्तक.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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