Syphillis- फिरंग रोग होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज क्या है ?

हेल्थ डेस्क- फिरंग रोग को आतशक, गर्मी, सिफिलिस आदि नाम से भी जाना जाता है. फिरंग रोग भारत में पहले नहीं था. पुर्तगीज लोगों के आने पर ही यह रोग भारत में फैला है इसलिए इस रोग को फिरंग अर्थात फिरंगियों से फैला रोग कहते हैं. इस रोग की सफल चिकित्सा भी सबसे पहले पंडित भावमिश्र जो भाव प्रकाश निघंटु पुस्तक के लेखक थे, ने ही की थी. अब भी इस रोग की पूर्ण सफल चिकित्सा भारत के अतिरिक्त और कहीं नहीं होती है. हालाँकि अब ऐसा नही रहा बल्कि सभी देशों में इलाज होने लगा है.

फिरंग रोग होने के कारण क्या है ?

फिरंग रोग होने के कारण वेश्याओं के साथ शारीरिक संबंध बनाना है. यह संसर्ग रोग है, महिलाओं को पुरुषों से एवं पुरुषों को महिलाओं से यह रोग होता है. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के वस्त्र आदि धारण करने से भी यह रोग फैल सकता है. रोग ग्रस्त पुरुष या स्त्री से जन्म लेने वाला बालक को भी यह रोग जन्म से ही हो जाता है. यह रोग दीर्घकाल तक रहता है. यह वहि;अभ्यंतर और बहिर्अभ्यंतर होता है.

फिरंग रोग के लक्षण क्या है ?

बाह्य फिरंग में लिंग के अग्रभाग पर या मनी पर घाव होता है. पीप या रक्त निकलता है, शोथ, दर्द, दाह, ज्वर हो जाता है. पेशाब में दाह और पीड़ा होती है.

महिलाओं में योनि के समीप घाव होते हैं. खुजली होती है. पीप और रक्त आदि निकलते हैं. किसी फिरंग रोगी को उरुसंधि में की बाजू में बद्ध अर्थात गांठ भी निकलती है. गांठ बड़ी, छोटी और कठिन होती है. उसमें दर्द होता है और फटकर पीप रक्त बहती है. चिकित्सा से यह कभी- कभी बैठ जाती है कभी फूट जाती है तो पीप व रक्त निकलता है.

Syphillis- फिरंग रोग होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज क्या है
Syphillis- फिरंग रोग होने के कारण, लक्षण और आयुर्वेदिक इलाज क्या है

कभी-कभी यह गांठ टांग में फोड़े- फुंसी आदि से भी बक्षण संधि में निकलती है. यह अलग और साधारण है. टांग के फोड़े- फुंसियां पीचककर अपने आप मिट जाते हैं. किसी रोगी के केवल लिंग पर व्रण होता है और किसी को केवल व्रण और गांठ तो किसी को केवल व्रण होता है. किसी को पूयमेह और फिरंग एक साथ भी होते हैं. दोनों के सब लक्षण प्रकट होते हैं.

आभ्यंतर फिरंग के लक्षण-

सभी छोटी-बड़ी जोड़ों में सूजन, तीव्र वेदना, बुखार, पेशाब में जलन, दर्द के कारण रोगी हाथ पाव न उठा सके, कभी हाथ- पाव या अंगुली मुड़ जाए या टेढ़ी हो जाए. यदि किसी को आभ्यंतर फिरंग तथा बहिः फिरंग एक साथ हो तो दोनों के लक्षण एक साथ प्रकट होती हैं.

उपद्रव-

कृशता, निर्बलता, नाक बैठना, नाक की अस्थियां टूट जाए, हड्डियाँ टेढ़ी होकर सूख जाए, शरीर भर में विषैले फोड़े हो, काले दाग पड़े, पक्षाघात हो, मंदाग्नि, बातरक्त आदि होते हैं.

फिरंग रोग का घरेलू उपाय क्या है ?

1 .फिरंग रोग में सूरजमुखी के पत्तों को खटाई की तरह पीसकर उसका लेप करने से अच्छा लाभ होता है.

2 .फिरंग रोग से जल्दी छुटकारा पाने के लिए सत्यानाशी के पंचांग का रस या पीला दूध लगाने या मालिश करने से फिरंग में लाभ होता है. सत्यानाशी की स्वरस में हल्का नमक मिलाकर लंबे समय तक सेवन करने से भी ठीक हो जाता है.

3 .पिया बासा के 8- 10 पत्तों के साथ दो-तीन नग काली मिर्च को पानी में पीसकर रोगी को पिलाने से फिरंग रोग में लाभ होता है.

4 .पीपल के कांड की 50 ग्राम सुखी छाल को जलाकर राख फिरंग पर लेप करने से घाव ठीक हो जाता है.

5 .कटेरी के फलों के रस में बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर लगाने से फिरंग, उपदंश एवं शरीर की एलर्जी में काफी लाभ मिलता है.

6 .सफेद कनेर की जड़ को पानी के साथ पीसकर फिरंग के घाव पर लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाते हैं.

7 .फिरंग रोग के घाव पर गुड़हल के पत्तों का लेप करने से शीघ्र नष्ट हो जाता है.

8 .फिरंग रोग में गोरखमुंडी के पत्तों को पानी के साथ पीसकर लेप करने अथवा पत्ते का रस लगाने से अनेक चर्म रोग, फिरंग के घाव आदि रोग नष्ट हो जाते हैं.

9 .भृंगराज के पत्तों को मेहंदी और मरवा के पत्ते के साथ पीसकर लेप करने से फिरंग के घाव में लाभ होता है. अथवा भृंगराज के पत्तों का रस 2 भाग, काली तुलसी के पत्ते का रस एक भाग मिलाकर दिन में दो-तीन बार लगाते रहने से जलन शांत हो जाती है और शरीर पर किसी भी प्रकार का दाग नहीं पड़ने देता है.

10 .फिरंग रोग में बरगद की जटा के साथ अर्जुन की छाल, हरड़, लोध व हल्दी बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर लेप करने से लाभ होता है.

फिरंग रोग का आयुर्वेदिक चिकित्सा क्या है ?

1 .सबसे पहले फिरंग रोग में विरेचन दें. सबीर वटी दो-दो और सारिवादि चूर्ण 3 ग्राम, कपिल चूर्ण 1/2 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ सेवन कराएं.

2 .कांचनार गुग्गुल 3-3 गोली दिन में तीन बार पानी से सेवन कराएं.

3 .घाव पर गुलाबी मलहम लगावें. गांठ हो तो काला मलहम की पट्टी लगाने से गांठ बैठ जाएगा या फूट जाएगा. फूटने पर उसमें गुलाबी मलहम लगावें.

4 .आभ्यंतर फिरंग हो तो आरोग्यवर्धिनी वटी 2-2 वरुण के क्वाथ या चोपचीनी के क्वाथ से दिन में 2-3 बार दें.

5 .सुबह- शाम मूल चंद्रोदय 4-4 गूंज मक्खन के साथ सेवन करावें.

6 .संखिया सत्व 50 मिलीग्राम मक्खन के साथ सुबह एक बार सेवन करावें. इस औषधि का सेवन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि मसूड़े और दांतो से ना लगे. यह औषधि यदि लगेगी तो मसूड़े में सूजन और खून आएगा. इस औषधि का सेवन करने वाले व्यक्ति को केवल शुद्ध घी, मक्खन, रोटी, पूरी, दूध आदि खाना चाहिए.पथ्य पालन अधिक आवश्यक है. मात्रा का ध्यान रहे, इस औषधि का सात- आठ दिन के अंदर ही पूरा असर होता है. घाव सूख जाता है, गांठे बैठ जाती है. संधियों की सूजन, दर्द आदि खत्म हो जाती हैं. टेढ़ी हुई अस्थियां ठीक हो जाती है. शरीर में हुए घाव विकार सब दूर हो जाते हैं. खून पूर्णता शुद्ध हो जाता है. इस औषधि के कारण मसूड़े आदि सूजे हो तो रस सिंदूर 4-4 गूंज सवेरे और रात को दूध से और शुद्ध गंधक 7-8 ग्राम दिन में 2 बार सेवन कराने से आराम हो जाता है.

7 .रस कपूर वटी 7-8 सवेरे और रात को दूध से लें और चोपचीनी चूर्ण 3-3 ग्राम दो बार सेवन कराएं. करंज पत्ती 25 ग्राम, कालीमिर्च 15-20 लेकर 200 मिलीलीटर पानी में पीसकर छानकर पीने से 21 दिन में ही फिरंग रोग खत्म हो जाता है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह जरूर लें क्योंकि रोग का सही निदान एवं औषधि की सही मात्रा का निर्धारण एक योग्य चिकित्सक ही कर सकता है एवं आपके रोग की स्थिति के अनुसार दवा का सेवन कराकर आपको रोग मुक्त कर सकता है. धन्यवाद.

स्रोत- आयुर्वेद ज्ञान गंगा पुस्तक.

Share on:

मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

Leave a Comment