हैजा रोग क्या है ? जानें कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

हेल्थ डेस्क- हैजा रोग को विसूचिका, कॉलेरा, कालातिसार, विसुची, दस्त और उल्टी का एक साथ होना, फ्लो ऑफ़ बाइल ( flow of bile ) आदि नामों से जाना जाता है.

हैजा रोग क्या है ? जानें कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

हैजा रोग क्या है ?

हैजा रोग छोटी आंत का एक संक्रमण है. जिसमे चावल के धोवन के तरह सफ़ेद रंग के पतले दस्त होते हैं. साथ ही उल्टी, हाथ- पैर और पेशियों में ऐंठन, पेशाब रुक जाना तथा निपट आदि के लक्षण मिलते हैं.यही हैजा या कॉलेरा कहलाता है. इस रोग में शरीर के अन्दर लवन और पानी की कमी हो जाती है.

यह हैजा जीवाणु के बिष से उत्पन्न होने वाला अत्यंत प्राणघातक रोग है. इस रोग का प्रसार महामारी के रूप में होता है. मतलब यह रोग एक व्यक्ति से दुसरे व्यक्ति को लग सकता है.

हैजा रोग होने के कारण-

हैजा रोग विब्रियो कॉलेरी नामक जीवाणु से उत्पन्न होता है. यह जीवाणु अर्ध विराम या कामा ( , ) के आकार के होते हैं. इस जीवाणु की विशेषता यह है कि यह मल और उल्टी में ही मिलता है.यह रक्त परिक्षण में कभी नही मिलता है.

हैजा रोग के सहायक कारण-

1 .हैजा रोग के प्रसार में मक्खियाँ सबसे महत्वपूर्ण कारण होती है. मक्खियाँ ऐसे किसी भोजन या विष्ठा पर बैठती है जिनमे हैजा के जीवाणु पहले से ही मौजूद रहते हैं जो मक्खियों के पैरों तथा पंखों से चिपक जाते हैं इसके बाद जब यह किसी शुद्ध खाद्य पदार्थ या भोजन पर बैठती है तो वह भी संक्रमित हो जाता है. जब इस संक्रमित भोजन को कोई स्वस्थ व्यक्ति खाता है तो उसकी आँतों में पहुचकर विब्रियो कॉलेरी रोग उत्पन्न कर विभिन्न लक्षण उत्पन्न करता है. इस प्रकार से हजारों व्यक्ति हैजा रोग के चपेट में आ जाते हैं.

2 .हैजा रोग की उत्पत्ति में स्थान विशेष एक सहायक कारण होता है.

3 .आद्रजलवायु, उष्णता,आनुपदेश तथा अधिक वर्षा इस रोग के प्रसार में सहायक कारण होते हैं.

4 .विभिन्न कारणों से उत्पन्न जठराम्ल की हीनता तथा बार- बार विरेचक औषधियां के प्रयोग से पाचन संस्थान की दुर्बलता इस रोग के आक्रमण में सहायक होती है.

5 .जिन स्थानों पर खुले जलाशयों का जमा पानी पीने में उपयोग होता है वहां इसका प्रसार अधिक होता है.

6 .बर्फ, आइसक्रीम या इसी प्रकार के ठंठे पेय पदार्थों द्वारा इसका प्रसार आसानी से होता है.

7 .रोग से मुक्ति के बाद पर्याप्त समय तक विब्रियो कॉलेरी रोगी के पित्ताशय में जमा हो सकते हैं. जहां से ये जीवाणु मल में पहुचकर हैजे का प्रसार कर सकते हैं.

8 .हैजे में रोगप्रतिरोधक क्षमता अत्यंत अस्थायी होती है.यानि एक ही व्यक्ति अनेक बार इस रोग की चपेट में आ सकता है.

संचय काल- कुछ घंटों से सप्ताहों तक.

हैजा रोग का आक्रमण अकस्मात होता है.

हैजा रोग का लक्षण क्या है ?

हैजा रोग में सामान्य रूप से निम्न लक्षण मिलते हैं.

1 .दस्त एवं उल्टी.

2 .दर्द और भ्रम.

3 .हाथ- पैरों में दर्द एवं ऐंठन.

4 .प्यास अधिक लगना.

5 .जम्हाई और दाह ( जलन ).

6 .होठों एवं नाखूनों का पीलापन.

7 .बेचैनी.

8 .समस्त शरीर में नीलापन तथा झुर्रियां.

9 .मांड के समान सफ़ेद रंग के दस्त.

10 .अतिसार की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक कमजोरी.

11 .नाड़ी क्षीणता.

12 .अँगुलियों में पानी से भींगे के तरह सिकुडन.

13 .आँखें अन्दर की ओर धस जाना.

14 .पेशाब कम होना या बंद हो जाना.

15 .त्वचा का ठंढा होना.

16 .पिंडलियों में अद्भुत सनसनाहट और ऐंठन होना.

हैजा रोग की अवस्थाएं-

हैजा रोग में मिलने वाले लक्षणों तथा चिन्हों की 3 अवस्थाएं होती है.

1 .परित्याग की अवस्था-

1 .इसे आक्रमणा अवस्था अथवा अतिसारावस्था भी कहते हैं. रोग की शुरुआत अतिसार ( दस्त ) से होता है दस्त पानी के तरह आने लगते हैं. दस्त पहले पीले फिर सफ़ेद रंग के आने लगते हैं और बार- बार होते हैं. मल में श्लेष्मिककला के परमाणु, इपिथेलिया, म्यूकस, असंख्य जीवाणु, लाल कण और श्वेत कण होते हैं. यह सफेदी लिए 10- 15 मिनट के अंतर पर होते हैं.

दस्त प्रायः चावल में मांड की तरह होते हैं. दस्त होते समय रोगी के पेट में किसी तरह का दर्द नही होता है. मल में एक विशेष प्रकार की गंध आती है.दस्तों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है. पहले 2-3 दस्त में मल आता है और फिर सफ़ेद रंग के पतले पानी जैसे दस्त होने लगते है.

पेट में हलकी गुड़गुडाहट और आध्मान जैसे महसूस होता है.लेकी कुंथन, मरोड़ या शूल का अनुभव नही होता है.

मल में पानी की मात्रा अधिक होती है. तथा मल को रखने पर उसमे लच्छेदार तलछट और ऊपर स्वच्छ पानी की तरह जम जाता है.

मल की प्रतिक्रिया क्षारीय तथा स्पेसिफिक ग्रेवेटी 1006 से 1012 तक होती है. सूक्ष्मदर्शक यंत्र से परीक्षा करने पर मल में विब्रियो कॉलेरी, रक्तकण, श्वेतकण, इपिथैलियल सैल्स आदि मिलते हैं.

दस्त के बाद उल्टी शुरू होती है. बार- बार दस्त और उल्टी होने के कारण अत्यधिक कमजोरी हो जाती है जिसके कारण रोगी उठने- बैठने से लाचार हो जाता है. जिसके कारण रोगी शैय्या पर पड़े- पड़े ही मल त्याग करने पर मजबूर हो जाता है. दस्तों की मात्रा 10- 15 लीटर तक भी हो सकती है.

2 .वमन ( उल्टी )- अतिसार होने के तत्काल बाद रोगी को वमन शुरू हो जाता है. वमन में पहले अन्न का अंश, आमाशयिक रस आता है फिर बाद में क्षुद्रान्त्र के पित और द्रव निकलते हैं. फिर बाद में वमन भी पानी की तरह पतला और सफ़ेद आने लगता है. जो चावल के माड़ जैसे सफ़ेद वरंग के होते हैं. वमन की मात्रा भी अत्यधिक और बार- बार होते हैं.

3 .पिपासा- शरीर बसे ज्यादा मात्रा में पानी निकल जाने के कारण प्यास अधिक लगने लगती है रोगी का मुंह बार- बार सूखते रहता है और वह पानी के अलावा किसी अन्य चीज की इच्छा व्यक्त नही करता है.

4 . शरीर की शिथिलता- बार- बार दस्त और वमन होने के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाने से शरीर शिथिल ( सुस्त ) हो जाता है.

5 .हाथ, पैर तथा पेट की मांसपेशियों में ऐंठन- शरीर से पानी के साथ बहुत सारा लवण, कैल्सियम तथा क्षारों के निकल जाने से नाड़ियों पर दुष्प्रभाव पड़ने से हाथ, पैर तथा पिंडलियों में ऐंठन होने लगता है और पेट की मांसपेशियों में भी ऐंठन होने लगती है.

6 .तापक्रम- जैसे- जैसे दस्त और उल्टी की संख्या बढ़ी जाती है शरीर का तापमान असामान्य होता जाता है.

7 . अल्पमूत्रता तथा मूत्राघात- कुछ समय के बाद रोगी का पेशाब कम आने लगता है और अंत में पेशाब आना बिलकुल बंद हो जाता है. मूत्राघात होकर खून में यूरिया की मात्रा बढ़ जाती है. साथ ही मूत्रविष्मयता (Uraemia ) के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं.

8 .पित की अनुपस्थिति- प्रायः सभी रोगियों में दस्त तथा उल्टी में पित की अनुपस्थिति मिलती है. इसके अलावा रोगी का जीभ शुष्क हो जाता है. रक्तचाप काफी कम हो जाता है. शरीर से पसीना आता है तथा पेशाब में प्रायः एल्बुमिन की उपस्थिति मिलती है.

नोट- यह अवस्था 5 से 10 घंटे तक रहती है.

2 .निर्जलीभवन और निपात की अवस्था- इसे शीतावस्था भी कहते हैं. दस्त शुरू होने के 5- 6 घंटे के पश्चात प्रायः 10-12 दस्त तथा 5-6 उल्टी होने के बाद यह स्थिति शुरू होती है. कभी- कभी यह स्थिति 24 घंटे बाद शुरू होती है. जिसमे ये लक्षण मिलते हैं.

1 .कभी- कभी एक बार के मल प्रवृति के बाद ही जीवनी विषमयता के कारण रोगी में निपात के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं.

2 . दस्त और उल्टी अधिक होने लगती है.

3 .रोगी अधिक कमजोर होकर असक्त हो जाता है.

4 शरीर से पसीना निकलने के कारण रोगी का तापक्रम अव- सामान्य यानि 95 डिग्री फारेनहाईट से निचे हो जाता है.

5 .हाथ, पैर की त्वचा सिकुड़कर सिलवटदार हो जाती है और त्वचा ठंढी हो जाती है.

6 .आँखें अन्दर की तरफ धस जाती है.

7 .शरीर में पानी की कमी होने से हाथ- पैर व पुरे शरीर में ऐंठन होने लगती है.

8 .होठ, नाखून और दांत नील पड़ जाते हैं और कपोल चिपक जाता है.

9 .त्वचा नीली और शुष्क हो जाती है.

10 .आवाज क्षीण हो जाती है तथा नाड़ी भी मंद, अनियमित और अस्पष्ट हो जाता है.

11 .रोगी को असाधारण बेचैनी होती है.

12 .रोगी की तीब्रता में ह्रदय की क्रिया क्षीण तथा अनियमित होती है.

13 .शरीर से अधिक पानी निकल जाने के कारण रक्त गाढ़ा हो जाता है जिसके कारण रक्त संचार सही ढंग से नही होता है जिससे मूत्राघात और विषमयता बढ़ जाती है.

14 .रोगी का रक्तचाप कम हो जाता है.

15 .श्वास की गति बढ़ जाती है.

16 . होठ और जीभ शुष्क हो जाती है.

17 .सोडियम और पोटैशियम क्लोराइड की हानि के कारण हाथ, पुर और मांसपेशियों में तीब्र दर्द और ऐंठन होने लगती है.

18 .ह्रदय शब्द मंद हो जाता है. रक्तचाप कम होकर 70 मिलीमीटर के आसपास हो जाता है.

19 .शरीर के सभी अंग सुखकर चिपक से जाते हैं. इसलिए रोगी का चेहरा मुरझा जाता है और नाक पतली पड़ जाती है.

20 .रोगी की त्वचा ठंढी पड़ जाती है फिर भी अन्दर से गर्मी महसूस होती है.

21 .रोगी अंत तक चिंतातुर तथा चेतन रहता है.

22 .इस रोग में होश अंत तक रहता है लेकिन युरिमिया प्रबलता होने पर बेशोशी का लक्षण उत्पन्न हो जाता है.

23 .निपात की अंतिम अवस्था में शरीर में पानी की कमी होने के कारण उल्टी और दस्त की मात्रा कम हो जाती है.

24 .अगर रोगी की सही और समय पर चिकित्सा नही मिल पाता है तो ह्रदय और रक्तवाहिनियों का बल क्षीण हो जाने से गुर्दों को फेल हो जाने से एसिडोसिस तथा युरिमिया के कारण मृत्यु हो जाती है.

अवस्था का समय- यह अवस्था 5 घंटे से लेकर 24 घंटे तक रह सकती है.

3 .प्रतिक्रिया की अवस्था- जो रोगी स्तब्धता के फलस्वरुप बच जाते हैं उनमे प्रतिक्रिया की अवस्था शुरू हो जाती है. उनमे ये निम्न लक्षण मिलते हैं.

1 .दस्तों और उल्टी की मात्रा कम होने लगती है और उल्टी एवं मल का रंग भी सामान्य होने लगता है.

2 .धीरे- धीरे नाड़ी गति भी सामान्य होने लगती है.

3 .ठंढा पसीना आना बंद होकर त्वचा गरम होने लगती है.

4 .रक्तचाप बढ़ने लगता है.

5 .रोगी को पेशाब होने लगता है और पेशाब की मात्रा बढ़ने लगती है.

6 . मल में पित का अंश आने लगता है शौच गाढ़ा और पीले रंग का होने लगता है.

7 .5-6 दिन के अन्दर रोगी पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है.

8 .रोगी के रंग बदल जाता है और उसे नींद भी आने लगती है.

9 .ह्रदय का बल बढ़ने लगता है.

10 .पानी का आंत्र से आंशिक प्रचुषण होने के कारण रोगी की बेचैनी कम हो जाती है.

नोट- उपर्युक्त अवस्थाओं में क्रमशः सुधर होकर रोगी स्वस्थ हो जाता है लेकिन इसके विपरीत कुछ रोगियों में अवसाद के अधिक समय तक रहने से प्रतिक्रिया तीब्र स्वरुप की होती है. जिससे बुखार कभी- कभी चरम सीमा तक पहुच जाता है. रक्तप्रवाह चालू होने के कारण आंत्र स्थित विष के रक्त में प्रविष्ट होने से तीब्र विषमयता उत्पन्न हो जाती है, जिसके कारण मूत्रविषमयता, मूत्राघात, प्रलाप, मूर्च्छा तथा परम ज्वर (Hyperpyrexia ) आदि अति गंभीर लक्षण उत्पन्न होकर रोगी की मृत्यु हो जाती है.

इस अवस्था में रोगी की मृत्यु निपात की अवस्था में उचित इलाज की व्यवस्था न करने तथा मूत्रविषमयता अथवा परम ज्वर की उचित चिकित्सा न करने से होती है. मृत्यु की संख्या 12% या 15% से अधिक नही होती है.

हैजा कितने प्रकार के होते हैं?

प्रायः हैजा 4 प्रकार के होते हैं.

1 .प्रवाहिका प्रधान- रोग का शुरुआत प्रवाहिका से होता है. इसमें बेचैनी, सफ़ेद रंग के पतले दस्त तथा हल्का बुखार रहता है.

2 .स्थानपदिक सौम्य विसूचिका- इस प्रकार के हैजा ( विसूचिका ) में सभी लक्षण सौम्य प्रकार के होते हैं. लंबे समय तक मल का रंग पिला ही रहता है.

3 .तीब्र विसूचिका- ऊपर बताये गए सभी लक्षण तीब्र विसूचिका में भी मिलते हैं.

4 .शुष्क विसूचिका- हैजा का यह सबसे तीब्र प्रकार होता है.इसमें शुरू से ही तीब्र विष मयता के लक्षण मिलते हैं. जबकि दस्त और उल्टी नाम मात्र की होती है.इसके लक्षण गंभीर निपट के होते हैं. रोगी का पेट फूल जाता है.

यह हैजा का घातक प्रकार है. इस रोग का विष इतना प्रबल होता है कि उल्टी और दस्त होने से पहले ही रोगी की मृत्यु हो जाती है. इस प्रकार के हैजा में प्रायः 3-4 घंटे में ही मृत्यु हो जाती है.

हैजा ( कॉलेरा ) के सम्बन्ध में आवश्यक बातें-

1 .हैजा में पानी और लवण की अत्यधिक कमी हो जाती है. खून का विशिष्ट गुरुत्व 1055 से बढ़कर 1065- 70 तक पहुच जाता है. विशिष्ट गुरुत्व 1 डी. बढ़ने का मतलब है कि 60 किलो शरीर भर वाले व्यक्ति में 150 मिलीलीटर पानी की कमी हो जाना. यानि इतना पानी व्यक्ति के शरीर से निकल चूका है. वास्तव में इससे कहीं अधिक पानी शरीर से निकल जाता है.

2 .हैजा के रोगी की नाड़ी कलाई पर टटोलने से प्रतीत नही होती है. यह कनपटी पर या कोहनी के मोड़ पर टटोलने से प्रतीत होती है.

3. रक्तचाप 70 मिलीमीटर से कम हो जाता है. इस समय गुदा का तापमान 105 डिग्री फारेनहाईट तक होता है.

4 .इस रोग में अत्यधिक उल्टियाँ होती है.उसमे तरल पदार्थ की मात्रा होती है. बिना जि मिचलाये तथा बिना प्रयत्न के ही उल्टियाँ होती है. यह कुछ मिनटों के अंतर पर होती है.

हैजा रोग का निदान-

उपर्युक्त लक्षणों के आधार पर रोग के निदान में कोई कठिनाई नही होती है.

हैजा रोग के असाध्य लक्षण क्या हैं?

दांत, होठ, नाखून काले पड़ जाए. चेतना शक्ति कम हो जाए. आँखों कि पुतली चढ़ जाए. स्वर भंग हो, सब संधियाँ शिथिल हो जाए. मूर्च्छा, दस्त, उल्टी बार- बार हो रुकने का नाम न ले. पेशाब आना बंद हो जाए.

हैजा रोग का आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपाय-

1 .जैसे ही हैजा रोग के फैलने कि संभावना हो वैसे ही इस रोग से बचने के उपाय शुरू कर देनी चाहिए ताकि इस रोग का आक्रमण ही नही हो. सादे, बासी और खुले पदार्थ का सेवन न करें. पानी को उबालकर तथा छानकर पिएं. मिष्ठान और गुरु पदार्थ का सेवन बंद कर दें.

2 .नींबू का रस, कोदना रस और प्याज का रस 1-1 चम्मच दिन में 2 बार पिएं और अग्निवर्धक द्रव्य सेवन करें.

3 .गाय के गोबर को कपडे में डालकर निचोड़कर उस पानी को रोजाना पीना हैजे के कोप से बचाता है.

4 .विसुची हर वटी 2-2 वटी 3 घंटे पर आवश्यकतानुसार दिन में 4-5 बार पानी, सौंफ या कोदने के अर्क से सेवन कराएँ. अमृतधारा 2-3 बूंद पानी में डालकर पिलायें तथा श्रीखंड चूर्ण 1 ग्राम, छर्दरिपु चूर्ण 1 ग्राम, लावान्गादी चूर्ण एक ग्राम, कर्पुर वटी 2 वटी ऐसी मात्रा दिन में 3-4 बार सेवन करने से हैजा में बहुत जल्दी आराम मिलता है.

5 .हैजा में पेशाब का रुक जाना घटक होता है इसलिए पेशाब जल्दी लाने के लिए यवक्षार, यव का पानी, गोक्षुरु हिम, कंकोल चूर्ण, नारियल पानी आदि पिलाना चाहिए.

5 .रोग गंभीर हो, हाथ पैर ठंढे हों,ऐंठन हो तो चंद्रोदय रस,सुवर्ण पर्पटी, कस्तूरी भैरव वटी, मृगमधासव आदि शक्ति योग उपर्युक्त चिकित्सा के साथ सेवन कराना चाहिए.

6 . शारीर को बहार से गर्म रखें,वायु को शुद्ध करने के लिए लोबान,गुग्गुल आदि का धुप या हवन करें. घर को साफ और पवित्र रखें. दस्त और उल्टी को मिटटी का तेल डालकर जला देना चाहिए.

7 .इलाइची 5 ग्राम,कोदना 10 ग्राम,कालीमिर्च 5 ग्राम,अनारदाना २० ग्राम को 2 लीटर पानी में उबालकर छानकर रखें और प्यास लगने पर यह पानी पिएं.

8 .लालमिर्च के बीज,चुना,लवंग,आक के फूल, भांग, कपूर बराबर मात्रा में पीसकर पानी से छोटे मटर के बराबर गोलियां बनाकर 1 गोली 2-2 घंटे पर पानी के साथ सेवन करने से हैजा शमन होता है.

9 . हैजा के रोगी को बर्फ चूसने को दें, खाने में केवल फलों का रस, दही और छाछ दें. पानी और अन्न न दें.

10 .प्याज का अर्क नमक डालकर गरम करके पिलायें.

11 .सौंफ, पुदीना का अर्क या शरबत बनाकर पिलायें.

12 .घोड़े की लीद का अर्क नमक डालकर गरम करें फिर ठंढा होने पर पिलाएं इस अर्क के पिलाने से मृत्यु को देने वाला हैजा ठीक हो जाता है.

13 .कालीमिर्च 1 ग्राम और अरहर की पत्ती 10 ग्राम पीसकर पिलाने से हैजा तुरंत शांत हो जाता है.

14 .आक की जड़ की छाल को पीसकर पाउडर बनाएं अब इस पाउडर को अदरक के रस में मर्दन कर छोटे मटर के बराबर गोलियां बना लें इस गोली को एक गोली दिन में 2-3 बार पानी के साथ खिलने से हैजा में लाभ होता है.

15 .आक की जड़ की छाल, छाछ और नमक तीनों को पीसकर अग्नि पर गरम करके पेडू तथा नाभि के बीच लेप करने से तुरंत पेशाब आने लगता है और हैजा से राहत मिलता है.

16 .कलमी सोड़ा, जवाक्षार और मिश्री को बराबर मात्रा में ( तीनों एक चम्मच ) ताजा पानी में शरबत बनाकर पिलाने से हैजा शमन होता है.

17 .जब तक पेशाब न हो हैजा के मरीज को कमर तक पानी में डुबोकर रखें. हलाकि जब सेलाइन ( पानी चढाने ) की व्यवस्था नही थी तब की जाती थी.

नोट- हैजा एक संक्रामक बीमारी है अतः इसके लक्षण मिलते ही डॉक्टर की शरण में जाएं और उचित चिकित्सा की व्यवस्था करें क्योंकि यह तेजी से फैलने वाली बीमारी है जो प्राणघातक भी हो सकती है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उदेश्य से लिखा गया है. किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चकित्सक की सलाह लें.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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