चेचक क्या है ? जाने कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

Helth desk- चेचक को मसूरिका, शीतला, बड़ी माता, चेचक, वेरीओला आदि नामों से जाना जाता है.

चेचक क्या है ?

चेचक एक तीव्र संक्रामक रोग है जिसमें एक विशेष प्रकार की पीडिकाएँ निकलती है जो पहले साधारण रक्तवर्ण की होती है और फिर तरलमय होकर पक जाती है और अंत में उन पर खुरंट बन जाता है और धीरे-धीरे खुद ही झड़ जाती है.

चेचक क्या है ? जाने कारण, लक्षण और घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

चेचक होने के कारण क्या है ?

चेचक होने का मुख्य कारण वेरीओला वायरस (Variola virus ) है.

चेचक की 4 वर्ष की अवस्था तक अधिक प्रकोप होता है लेकिन कभी- कभी युवावस्था में भी हो जाता है.

चेचक का अधिक प्रकोप फरवरी से अप्रैल महिना तक ज्यादा होता है.

चेचक का वायरस मुख, नासा तथा श्वास मार्ग की श्लेष्मकला द्वारा शारीर में प्रवेश करता है.

चेचक का प्रकोप शारीर में 7 से 21 दिन तक रहता है. औसतन 12 दिन का होता है.

चेचक का लक्षण क्या है ?

1 .बुखार होना-

इस रोग की शुआत में शीतपूर्वक बुखार होता है. बुखार के समय कपाल, कटि एवं पिंडलियों में अधिक दर्द, मितली, उल्टी, आक्षेप तथा प्रलाप के लक्षण होते हैं. बुखार होने के साथ- साथ प्यास अधिक लगती है. गर्मी, त्वचा की शुष्कता, चेहरा लाल तथा जीभ मलावृत होता है. और बुखार 103-4 डिग्री फारेनहाईट तक लगातार 4 दिन तक बना रहता है. चौथे दिन बुखार कम होकर विस्फोटों का निकलना शुरू हो जाता है. 2-3 दिन के बाद विस्फोटों में संक्रमण के कारण बुखार फिर से शुरू हो जाता है. विस्फोट खुरंट बनकर सूखने के बाद बुखार खुद ही ख़त्म हो जाता है.

2 .विस्फोट-

वास्तविक विस्फोट बुखार शुरू होने के तीसरे या चौथे दिन पहले मस्तक एवं कनपटी पर निकलते हैं इसके बाद क्रम से चेहरे, अग्रबाहू, मणिबंध, मध्य शारीर, पीठ, पेट, मुख की श्लेष्मकला तथा आँखों के भीतर निकलते हैं.

नोट- विस्फोट सबसे पहले ललाट पर और अंत में पैरों के तलवों पर निकलते हैं, यही चेचक की मुख्य विशेषता है.

दाने निकलने के बाद क्रम से बुखार आदि लक्षणों की न्यूनता हो जाने के कारण रोगी को कुछ आराम मिलने लगता है. विस्फोट निकलते समय शारीर में हल्का खुजली भी होती है.

विस्फोट के पास त्वचा रक्तवर्ण की होती है. विस्फोटों में तनाव होने के कारण त्वचा तथा शारीर में दर्द, कंडू और बेचैनी रहती है.

विस्फोटों में पूय ( पीप ) उत्पत्ति के कारण बुखार बढ़ जाता है. कोई उपद्रव न होने पर 3- 4 दिन के बाद विस्फोट निकलने के अनुक्रम से शुष्क होने लगते हैं.

धीरे- धीरे विस्फोटों के सूखने पर उसके जगह पर खुरंट बन जाते हैं और तीसरे- चौथे सप्ताह में खुद ही झड़ जाते हैं. लेकी हाथ- पैर के तलवों के खुरंट गिरने में कुछ ज्यादे दिन लगते हैं.

खुरंट के निकल जाने के बाद दाग बीच में खुच दबे से दिखलाई देते हैं.

त्वचा के अलावे होठ, मुख,गुदा, स्वरयंत्र, कंठनलिका, अन्न्मार्ग, आमाशय, मलाशय, योनि, नेत्र आदि स्थानों पर भी विस्फोट ( दाने ) निकलते हैं लें प्रायः यह पूयदार नही होते हैं.

पूय युक्त विस्फोटों के कारण शारीर से एक विशेष प्रकार की गंध निकलती है.

गंभीरता की दृष्टि से चेचक के अनेक भेद होते हैं.

1 . अल्प विस्फोट युक्त चेचक- इसमें बुखार नही रहता है और द्वितीयक संक्रमण रहित तथा दाने कम निकलते हैं.

2 .असम्मिलित प्रकार- इसमें दाने अधिक निकलते हैं लेकिन पृथक- पृथक संख्या में होते हैं.

3 .सम्मिलित प्रकार- इसमें दानों के अधिक निकलने से फोड़ा जैसा रूप धारण कर लेता है और शुरू से ही विषमयता रहती है.

4 .कृष्ण मसूरिका- इसमें अन्य स्रोतों से रक्तस्राव, विषमयता और मृत्यु की संभावना अधिक हो जाती है.

5 .रक्तस्रावी प्रकार- यह सबसे ज्यादा मिलने वाला प्रकार है. इसमें विस्फोटों के निकलने के बाद रक्तस्राव होता है और अंत में मृत्यु हो जाती है.

नोट- चेचक का सफल टीका ( Vaccine ) निर्मित हो जाने के कारण अब चेचक का पूर्ण निराकरण किया जा चूका है. अब चेचक के मरीज देखने को बहुत ही कम मिलते हैं.

चेचक के विषय में आयुर्वेद ग्रंथ का मत क्या है ?

चेचक एक संसर्गज और फैलने वाला रोग है. यह शीतला देवी के आक्रांत से, क्रूर ग्रहों के कारण, अत्यंत गर्मी या गर्म देश के कारण तथा अत्यंत उष्ण, खारे पदार्थ सेवन करने से होती है. पहले तीव्र बुखार होता है, ठंडी लगती है, छींकें, नाक से पानी आता है, आंखें और मुख लाल हो जाता है. तीन-चार दिन के बाद पूरे शरीर पर बड़े-बड़े और गहरे दाने निकलते हैं. दाने गोल और बड़े होते हैं, उसमें पानी और पीप होती है, खुजली और बेचैनी बहुत होती है, यह दाने 7 दिन में निकलते हैं और 7 दिन में भरते हैं. तीसरे सप्ताह में अपने आप सुखते हैं और उनके छिलके उतर जाते हैं बुखार भी खत्म हो जाता है.

चेचक के असाध्य लक्षण-

बहुत सारे दाने बड़े हो, आपस में दाने मिल जाए, दुर्गंध अधिक हो, बुखार ज्यादा हो, स्वर भंग, कफ से गला रूंध जाए, प्रलाप हो, बुखार एकाएक उतर जाए, शरीर ठंडा हो जाए या फिर बुखार कम ही ना हो. या दाने देर से निकले, दाने निकलते- निकलते रुक जाए. दाने काले रंग के हो, गोल होने के बदले दाने कांटेदार हों. पीप के बदले दानों में रक्त हो, ताप आने के पहले ही दाने निकले, दाने भर जाने के बाद भी बुखार कम ना हो तो यह लक्षण असाध्य होता है.

चेचक साध्य लक्षण-

यदि दाने सफेद, चमकीले और उठे हुए हो, पेट और छाती पर कम हो तो साध्य है. किसी- किसी के आंख में भी दाना निकल जाता है तो आंख में फूल हो जाता है. माता उतर जाने के बाद दाने के गड्ढे में दाग हो जाते हैं.

चेचक का घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय-

1 .जब दाने निकलने लगे तब चिकित्सा बंद कर देनी चाहिए. घर में साफ- सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें. कपड़ों और बिस्तर सफेद व स्वच्छ रखें. नीम की पत्ती से झाड़ना चाहिए. द्वार और खिड़की पर नीम की पत्ती लगानी चाहिए. हवन, पूजा- पाठ आदि करनी चाहिए. इसके लिए विशेष मंत्र और भजन चाहिए. भजन से संतोषजनक लाभ होता है.

2 .संगीत आयुर्वेद की आकाश तत्व के द्वारा चिकित्सा करने की विधि है. बड़ी माता का दाना आंख में ना निकले के लिए आंखों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. आंखें ठंडे पानी से साफ करनी चाहिए और काले अंजन में भीमसेनी कपूर डालकर गुलाब जल से पीकर आंखों में लगाना चाहिए.

3 .चेचक के दानों में खुजली अधिक होती है लेकिन खुजलाना नहीं चाहिए. खुजलाने से दाने फूट जाते हैं और आपस में मिल जाते हैं तो कष्टकारी हो जाते हैं. कभी- कभी उस कारण हाथ- पांव आदि अंग विकृत हो जाते हैं.

4 .यदि कोई दाना फूट जाए तो अपलों की कपड़ खान राख या गोदंती भस्म उस पर डालनी चाहिए. खुजलाएं नहीं, हवा करनी चाहिए. कपास के रुई से सहलाएं. धूप और रोशनी से दूर ठंडी और शांत जगह में रोगी को रखें.

5 .दाने बराबर ना निकले हो तो बड़ी इलायची दूध में पकाकर उस दूध को पिलाएं. ऐसा करने से दाने तुरंत निकलते हैं और कष्ट से राहत मिलता है.

6 .यदि कुछ दाने निकल कर दब जाए तो सौंफ 10 ग्राम, अंजीर 3 दाने, काली द्राक्ष 10 दाने का क्वाथ बनाकर पिलाएं.

7 .दानें पर चंदन आदि तेल लगाने से खुजली कम होती है.

8 .चंदन और कपूर में पानी डालकर रोगी को सुंघाने से दिल और दिमाग को आराम मिलता है बेचैनी कम होती है.

9 .गाजवान, डनाभ, पितपापड़ा 10- 10 ग्राम भिगोकर सवेरे छानकर उसमें खड़िया शक्कर डालकर प्रतिदिन पिलायें. इससे रोग बढ़ेगा नहीं और उपद्रव भी नहीं होगा.

10 .यदि दिन में तीन- चार बार दस्त हो तो प्रवाल पिष्टी, जहरमोहरा पिष्टी, 4- 4 गूंज इसबगोल के पानी से सेवन कराएं.

11 .यदि दानें गहरे हो और मिटे नहीं तो कपूर तिल तेल में डालकर लगाएं. घटाद, खील और शंख जीरा लगाएं.

12 .चेचक मीट जाने के बाद पानी में खड़िया शकर डालकर उससे मूख को धोएं. महालाक्षादी या कुमकुम तेल लगाने से माता के दाग मिट जाते हैं.

13 .आंख में फूल हो जाए तो शुद्ध तूतिया 10 ग्राम, मिश्री 10 ग्राम और गुलाब जल 100 मिलीलीटर मिलाकर दो-चार बूंद आंख में डालें. यह आँख में लगेगा. लेकिन 10- 12 दिन में ही आराम मिलेगा. आँख बिल्कुल ठीक हो जाएगी.

14 .चेचक वाले लोगों को जोश और गुस्सा अधिक आता है अतः उसे शांत रखें और हल्का भोजन दें. स्निग्ध पदार्थ दें.

15 .पटोल की जड़ का क्वाथ या पटोलपत्र का क्वाथ बनाकर गन्ने के रस के साथ रोगी को पिलाने से चेचक के दाने जल्दी शांत हो जाते हैं.

16 .अडूसा, नागरमोथा,चिरायता, हरे, बहेड़ा, आंवला, इंद्रजौ, जवासा,कडुआ परवल तथा नीम के पत्ते का क्वाथ बनाकर रोगी को पिलाने से चेचक से जल्दी राहत मिलता है.

17 .सिरस की छाल, गूलर की छाल, नीम के पत्ते खैर के पत्ते को पीसकर लेप करने से चेचक शांत होता है.

18 .गले तथा मुख में चेचक के दाने निकलने पर आंवला तथा मुलेठी का क्वाथ बनाकर कुल्ला करने से लाभ होता है.

19 .पत्थर सगा नाम की बूटी की जड़ गंगा जल में पीसकर दिन में 2 बार पिलावें तथा सर से पैरों की तरफ छिड़काव करें तो दबे हुए दाने आसानी से निकलता है और दर्द भी कम होता है.

20 .तुलसी की जड़ गंगाजल में पीसकर दिन में दो बार एक- एक चाय चम्मच पिलावें तथा नीम की 7 सीकों से सिर से पैर तक छिड़काव करें तो दाने आसानी से निकलते हैं और कष्ट कम होता है.

चेचक रोकने के आयुर्वेदिक उपाय-

1 .जंगली केले के 10 बीज प्रतिदिन पानी से 7 दिन तक सेवन करने से 1 वर्ष तक चेचक नहीं निकलता है. इसलिए ऐसे प्रतिवर्ष सेवन करना चाहिए.

2 .चेचक निकलने के समय गधी का दूध एक चम्मच प्रतिदिन देने से भी चेचक नहीं निकलता है.

3 .मसूरिका उत्पन्न होते ही हुरहुर की जड़ का स्वरस या चन्दन का क्वाथ बनाकर पिलायें.

4 .नीम का बीज, बहेड़े का बीज, स्याह- मिर्च तुलसी के पत्तों के रस में मर्दन कर मूंग प्रमाण गोली बना लें. इस में से 1- 2 गोली चेचक वाले दिनों में सेवन करने से चेचक निकलने का भय नही रहता है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उदेश्य से लिखा गया है. किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की राय जरुर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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