महिलाओं को कष्टार्तव रोग क्यों होता है? जाने कारण, लक्षण और 20 घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

हेल्थ डेस्क- इस रोग में मासिक धर्म के समय बहुत जोर का दर्द होता है. मासिक स्राव चाहे अधिक आवे या बहुत ही कम आवे, लेकिन महिला दर्द के मारे बेचैन हो जाती है. यह दर्द किसी- किसी समय में इतना तेज हो जाता है कि महिला बेहोश तक हो जाती है. दर्द प्रायः पेडू से शुरू होकर विभिन्न स्थानों में फैल जाता है. मासिक स्राव के साथ- साथ या स्राव के पूर्व से ही दर्द शुरू हो जाता है. दर्द का स्थान विशेष रूप से पेट होता है. साथ ही पेट के मध्य में दर्द होती है जो मध्य पेट से शुरू होकर नितंबों की ओर जाती है और कभी-कभी टांगों की ओर भी चली जाती है. कभी-कभी पीड़ा पीठ में भी हो सकती है. यह पीड़ा कभी लगातार चलने वाली और कभी रुक- रुक कर चलने वाली होती है और तेज होती है. बाद में लगातार चलती रहती है. यह दर्द मासिक स्राव के प्रथम और दूसरे दिन तक जारी रहती है और कभी-कभी मासिक धर्म के अंतिम दिन तक भी चला करती है. दर्द का जो रुक-रुककर प्रहार होता है वह कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों तक हो सकता है और यह रुक- रुककर दर्द का प्रहार प्रारंभ में नहीं हुआ करता है.

महिलाओं को कष्टार्तव रोग क्यों होता है? जाने कारण, लक्षण और 20 घरेलू एवं आयुर्वेदिक उपाय

जब मासिक धर्म कम मात्रा में 2 दिन के लिए होता है तब महिला के वस्तिगह्वर छोटे होते हैं. ऐसी महिलाएं अक्सर बांझ रहती हैं. दर्द गर्भाशय से उत्पन्न होती है इसका कारण यह है कि गर्भाशय की ऊपर की तह मोटी और सख्त होती है और मासिक रक्त के चुने में बाधा उपस्थित करती है. जब यह मासिक रक्त अधिक मात्रा में निकलना शुरू हो जाता है तो दर्द शांत हो जाती है.

कष्टार्तव रोग होने के क्या कारण है ?

यह रोग विभिन्न कारणों से उत्पन्न होता है. इनमें गर्भाशय का विकृत विकास, गर्भाशय की रचना में विकार जैसे- गर्भाशय का दो भागों में विभक्त हो जाना आदि मुख्य कारण है. इसके अलावा गर्भाशय का अपने स्थान से हट जाना तथा गर्भाशय की पेशियों की हीनता रजःस्राव का अप्राकृत होना. इस में खून के थक्के निकलते हैं जिससे दर्द होती है इत्यादि इस रोग के कारण हैं.

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इसके अतिरिक्त अति उग्र संगम इच्छा, कृत्रिम अथवा अप्राकृतिक मैथुन, उपदंश बिष, अति शारीरिक संबंध बनाना, स्नायु प्रधान धातुवात, स्वास्थ्य गिरना आदि इसके प्रारंभिक कारण होते हैं. भय, क्रोध, सुख, मानसिक आवेग, मिथ्या आहार-विहार, व्यायाम, स्वभाव और अतिरिक्त वायु प्रकृति के वशीभूत होने से यह रोग पैदा होता है. जरायु रक्त संचय, मासिक के एकदम पहले अथवा बाद शारीरिक संबंध बनाना, ठंडक आदि के लग जाने से भी यह रोग हो जाता है. सभ्यता की प्रगति के साथ-साथ इस रोग की भी प्रगति दिन पर दिन बढ़ती जाती है. तीव्र स्वरूप का वेदना युक्त मासिक स्राव प्रायः उन महिलाओं में अधिक मिलता है जो विशेष रूप से आराम का जीवन व्यतीत करती हैं. आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियां भी इस रोग की उत्पत्ति में सहायक होती है.

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अनुचित शिक्षण अथवा उपदेश का भी रोग पैदा करने में कुछ अपना स्थान है. माताएं कई बार मासिक धर्म को बीमारी मान लेती हैं और वह इसी प्रकार की शिक्षा अपनी लड़कियों को भी देती है. जिससे लड़की भी मासिक धर्म को रोग मानने लगती है वह मासिक धर्म के समय विशेष कष्ट का अनुभव करती है.

रोग भेद- इस रोग को चार भागों में बांट सकते हैं ?

1 .रक्ताधिक्य अर्थात खून की अधिकता के कारण कष्टार्तव.

2 .आकुन्चन जन्य अर्थात आक्षेप के कारण कष्टार्तव.

3 .झिल्लीदार बाधक.

4 .स्नायविक अर्थात नाड़ीजन्य कष्टार्तव.

1 .रक्ताधिक्य के लक्षण-

यह प्रायः 30 वर्ष से अधिक उम्र वाली महिलाओं में मिलता है. मासिकधर्म के दो-तीन दिन पहले से श्रोणी में भारीपन प्रतीत होने लगता है. चिड़चिड़ापन, अवसाद और अन्य मानसिक लक्षण भी होती हैं. साथ ही सिर दर्द, बेचैनी और स्तनों में कष्ट रहता है. श्रोणी में भारीपन के साथ-साथ पेट की अधो भाग तथा कटी प्रदेश में तीव्र वेदना पाई जाती है जो स्राव के प्रारंभ होने पर स्वतः कम हो जाती है.

जिन्हें खून की अधिकता के कारण यह रोग होता है उनका शरीर खून से भरा रहता है. मासिक स्राव में बाधाएं आती है साथ ही जरायु अपने स्थान से हट जाता है. छोटी उम्र की महिलाओं की अपेक्षा अधिक उम्र की महिलाओं के जरायु में खून की अधिकता के कारण ऐसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं. उनके तलपेट में बोझ जैसा मालूम पड़ता है. अधिकांश रोगियों को बवासीर हो जाती है. पेशाब करने में कष्ट होता है तथा मूत्र के साथ- साथ खून के थक्के आते हैं.

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प्रसव के पश्चात तथा नियम जरायु के संकुचित न होने, ठंडक लगने अथवा मानसिक उद्वेग के कारण मासिक धर्म बंद होने पर इस प्रकार की रोग उत्पन्न होती है. आमवात तथा साधारण गठिया से पीड़ित युवतियों को भी यह रोग विशेष कष्ट देती है.

मासिक धर्म होने पर खून थोड़ा-थोड़ा करके बाहर आता है और इसी से महिला कष्ट का अनुभव करती है. महिला को भयानक दर्द के साथ बुखार भी हो सकता है.

2 .आपेक्षिक कष्टार्तव के लक्षण-

बाधक दर्द के साथ-साथ यदि प्रसव जैसा दर्द महिला अनुभव करती हो, साथ ही दर्द रूक- रूककर लहर की भांति घटता बढ़ता हो तो उसे आक्षेपिक कष्टार्तव समझना चाहिए. इसके लक्षणों का निरूपण इस प्रकार है-

महिला को दर्द आक्षेप एवं प्रसव की भांति प्रकट होता है जो एकाएक घटता- बढ़ता है. यह दर्द लेटने से भी कम नहीं होता. इस प्रकार के विकार में दर्द का प्रारंभ मासिक धर्म के साथ अथवा प्रथम दिन से ही होता है. दर्द बड़ी तीव्र तथा अल्पकालिक होती है. यह दर्द कभी-कभी इतना उग्र स्वरूप की हो जाती है कि महिला बेहोश एवं मूर्छित तक हो जाती है. यहां तक कि अवसाद के लक्षण भी मिलते हैं. दर्द प्रायः उदर या कटी प्रदेश में हुआ करती है जो स्राव की मात्रा बढ़ने के साथ-साथ कम हो जाती है. इस प्रकार का विकार प्रायः युवतियों में विशेष रूप से देखने को मिलता है. 35 वर्ष की आयु के बाद प्रायः नहीं मिलता है.

इस विकार से पीड़ित लड़कियां प्रायः कुमारी या निःसंतान होती है. उनकी श्रोणी में कोई रोग नहीं होता है. लेकिन किसी- किसी लड़की का गर्भाशय अल्पवकसित अवस्था में होता है. महिला को दर्द के अतिरिक्त मिचली आना तथा उल्टी के लक्षण भी मिल सकते हैं. महिला चिंता युक्त तथा दुर्बल होती है. उसके सब अंगों का विकास पूर्ण रूप से प्राकृत होता है.

इसके कारणों के संबंध में तीन प्रकार के मत हैं- अवरोधजन्य, हार्मोन का असंतुलन तथा मानसिक घटक.

3 .झिल्लीदार कष्टार्तव के लक्षण-

इसमें मासिक स्राव खून के साथ पेट में दर्द होकर जरायु की श्लेष्मिक झिल्ली का स्तर निकला करता है जो देखने में कफ के समान होता है. यह मासिक धर्म के दूसरे या तीसरे दिन से निकलना शुरु होता है. यह विकार विशेष रूप से अविवाहित महिलाओं में मिलता है. यदि यह रोग किसी कारण विवाहित महिलाओं में मिलता है तो वह शीघ्र ही बांझ का रूप ले लेती है.

किसी- किसी महिला में जरायु के आकार की समूची झिल्ली भी निकलती है. वह झिल्ली तिकोने आकार की होती है. यह झिल्ली प्रायः मासिक स्राव के तीसरे दिन निकलती है. अनेक परिवारों में यह प्रसूति के बाद पाई जाती है. इसमें पूरा का पूरा अंतरावरण एक कास्ट के रूप में निकलता है. सांप की केचुली की भांति गर्भाशय से छूटती है तथा छूटने में अधिक कष्ट होता है. झिल्लीदार कष्टार्तव प्रायः गंभीर माना जाता है.

अनेक महिलाओं में 2 माह के अंतर से गर्भ स्राव हुआ करता है. इसके साथ ही झिल्ली भी गिरती है. जिसे गर्भस्राव न मानकर मेंब्रेन डिसमैनरिया कहते हैं. जिनकी जरायु की श्लेष्मिक झिल्ली में सौत्रिकतंतु की अधिकता होती है. उन्हें यह रोग अधिक होता है. यदि यह रोग दीर्घकाल तक चलता रहता है तो महिला बांझ हो जाती है. झिल्लियों को देखकर रोग का निर्णय किया जा सकता है. झिल्ली पर जरायु की गांठों के चित्र दिखलाई पड़ते हैं. यदि यह संदेह हो कि गर्भस्राव है तो दो- तीन मास तक निरंतर पति-पत्नी को अलग रखकर सावधानी पूर्वक रोग का निर्णय किया जा सकता है.

4 .स्नायविक डिसमैनरिया के लक्षण-

जिन्हें कुछ अधिक अवस्था में मासिक स्राव होता है उनके डिंबकोषों की अपरिपुष्ट्ता के कारण मासिक धर्म होने के 2 दिन पहले से जरायु के स्थान में दर्द होने लगता है. इस प्रकार मासिक धर्म शुरू हो जाने की तीन दिनों तक निरंतर तेज दर्द होती है. यहां तक की महिला दर्द के मारे झटपटाने लगती है. यह दर्द पेट से शुरू होकर पेट और जांघों तक फैलता है. साथ ही दर्द रुक-रुककर होती है और इसके आवेग से महिला को मिर्गी जैसी मूर्छा आती है. कभी-कभी सिर दर्द भी होता है. मूर्छा के बाद दर्द कुछ कम हो जाता है. जब इसका आक्रमण होता है तो महिला अकर्मण्य तथा निस्तेज हो जाती है. उसका किसी काम में मन नहीं लगता है. उसकी स्मरण शक्ति भी कम हो जाती है. महिला को शारीरिक संबंध के समय तेज दर्द की अनुभूति होती है. इस विकार से पीड़ित महिला को प्रसव के समय भी असहनीय दर्द होता है.

कष्टार्तव रोग का इलाज न किया जाए तो क्या हो सकता है ?

रोग की उचित चिकित्सा न होने पर विभिन्न प्रकार के विकार पैदा हो जाते हैं. यदि किसी महिला को अल्प मात्रा में मासिक धर्म होता है साथ ही रोग दीर्घकाल तक चलता है  रजोबंध रोग पैदा हो जाता है. जिन्हें खून की अधिकता से रोग पैदा होता है उन्हें रक्तस्राव का रोग हो जाता है. किसी- किसी को श्वेत प्रदर तथा पुराना जरायु प्रदाह रोग हो जाता है. जिन्हें खून की कमी से रजोबंध होता है बाद में दूसरे शरीर द्वारों से रक्त निकलने का अनुकल्प रजः होता है. जैसे नाक इत्यादि से.

कष्टार्तव रोग की आयुर्वेदिक एवं घरेलू चिकित्सा-

1 .रोग की प्रधान चिकित्सा करना रोग के कारणों को दूर करना है.

2 .यह रोग लड़की के विवाह के पश्चात समाप्त हो जाता है तथा बच्चा पैदा होने के बाद नहीं होता है.

3 .सामान्य स्वास्थ्य को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए, इसके लिए पौष्टिक आहार विहार के द्वारा उसकी कमजोरी को दूर की जानी चाहिए.

4 .महिला को स्वच्छ, खुली हवा एवं प्रकाश में व्यायाम तथा परिश्रम करना चाहिए.

5 .उचित ज्ञान के द्वारा मासिक स्राव के प्रति महिला के मनोभाव में परिवर्तन ले आना चाहिए, साथ ही उसे गृहस्थ जीवन व्यतीत करने का उपदेश देना चाहिए. महिला को ऐसा आश्वासन देना चाहिए कि उसे कोई खतरनाक रोग नहीं है. साथ ही उसे यह भी बता देना चाहिए कि भविष्य में उसे बांझपन आदि कोई रोग नहीं होगा.

6 .महिला को कब्ज ना हो इसके लिए उसे प्रतिदिन सामान्य विरेचन एवं पाचन युक्त चीजों का सेवन कराना चाहिए. इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए. लेकिन अधिक दस्तावर दवा नहीं देनी चाहिए. इससे हानि होती है तथा ऐसी स्त्रियों को विरेचन देने से आंत्र में प्रक्षोभ बढ़ता है.

7 .गर्भाशय की क्रियाशीलता को ठीक करना चाहिए.

8 .अंकुरित अन्न गेहूं आदि का पर्याप्त मात्रा में सेवन कराना चाहिए.

9 .यदि मासिक धर्म अधिक मात्रा में आता हो तो कैल्शियम युक्त चीजों का सेवन कराना चाहिए.

10 .गरम पानी की बस्ति, स्नान और मिट्टी की गीली रोटी को शाम को तलपेट पर रखना चाहिए. शीघ्र पचने वाला पौष्टिक आहार देना चाहिए.

11 .गरम बोतल से पेट की सिकाई करनी चाहिए. पैरों को गर्म पानी में रखना चाहिए. मासिक धर्म के समय ठंडे पानी से स्नान नहीं करना चाहिए.

12 .आयुर्वेद के मतानुसार योनि गत वायु रोग है. जिसमें खून दूषित हो जाता है. इसके लिए रक्तशोधक एवं रक्तवर्धक योगों तथा रस सिंदूर, स्वर्ण सिंदूर, लौह भस्म तथा भोजन में तिल, गुड़, दही, अम्ल पदार्थ, मछली, बैगन, उड़द आदि का पर्याप्त मात्रा में सेवन कराना चाहिए. उष्ण द्रव्यों का सेवन इस रोग में उपयोगी बताया गया है. इन द्रव्यों के सेवन से श्रोणीगत अंगों में रक्ताधिक्य बढ़ता है.

13 .मासिक स्राव के समय गर्म बोतलों से पेडू का सेक करना तथा महिला को गर्म पानी पीने को देना चाहिए. कुछ लोग सोठ, बादाम,गुड़, दूध और घी गर्म करके मिलाकर देते हैं.

14 .उलट कंबल की छाल का चूर्ण, काली मिर्च के चूर्ण के साथ गर्म पानी में मासिक धर्म के दो-तीन दिन पहले से देना शुरू कर देना चाहिए. इसके बीच- बीच में महिला को रजःप्रवर्तनी वटी देना चाहिए.

15 .मासिक धर्म के पीछे तिल के क्वाथ के साथ गुड़, सोठ, मरीच, हींग, पीपल और भारंगी मिला कर देना चाहिए. इसमें गाजर और मूली के बीज भी मिला सकते हैं.

16 .दर्द को कम करने के लिए कुमारिका वटी, नष्टपुष्पांतक रस और संविदासार का उपयोग फायदेमंद होता है. गर्भवती गाय का दूध पीना भी लाभकारी बताया गया है. गाय मूत्र में अंतःस्राव ग्रंथियों का अंतःरस रहता है. दर्द में वृहत् वात चिंतामणि रस, चतुर्मुख एवं बज्रक्षार का उपयोग फायदेमंद होता है.

17 .लाल कमल की जड़ 1 ग्राम, लाल चंदन 1 ग्राम, लाल कपास की जड़ 1 ग्राम, लाल जिमीकंद 1 ग्राम, मौलश्री की जड़ 1 ग्राम, सुगंध बाला 1 ग्राम, कनेर की जड़ 1 ग्राम, जीरा 1 ग्राम सभी को कूट पीसकर चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें. अब इसमें से 6 ग्राम की मात्रा में चावल भिगोए पानी के साथ सुबह- शाम सेवन कराएं. यह दर्द को दूर करने में मददगार होगा.

18 .कपास के पौधे की जड़ 6 ग्राम, गाजर के बीज 6 ग्राम, सोया के बीज 4 ग्राम, खरबूजा के बीज 4 ग्राम. इन सब को अधकुटा करके क्वाथ बनाकर पिने से अल्प मासिक स्राव दूर होकर कष्टार्तव में लाभ होता है.

19 .आमला कर गंधक 1 ग्राम, काला जीरी 1 ग्राम, रसौत 3 ग्राम और एक्सट्रैक्ट बेलाडोना 3 ग्राम इन सब को मकोय के रस में खरल करके मटर के बराबर गोलियां बना लें. अब इसमें से एक- एक गोली सुबह- शाम गाय के गर्म दूध के साथ सेवन कराएं. इस योग के प्रयोग से कष्टरज एवं मासिक धर्म संबंधी रोग दूर हो जाते हैं.

20 .औषधि चिकित्सा के साथ-साथ निम्न व्यवस्था में विशेष उपयोगी मानी गई है-

गरम पानी के टब में आधी भी मुट्ठी पीसे हुए तिल डालकर उसमें महिला को 15 मिनट तक बैठाएं. टब में पानी इतना हो की महिला की पेडू यानी पेट का निचला भाग पानी में रहे. इससे मासिक धर्म खुलकर बिना कष्ट के साथ आता है. इस व्यवस्था का उपयोग करना तीव्र दर्द में अन्य चिकित्सा के साथ किया जाना विशेष लाभकारी होगा.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है. किसी भी प्रयोग से पहले योग्य चिकित्सक की राय जरूर लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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