गर्भ में लिंग का निर्माण कैसे होता है ? कैसे जाने लड़का है या लड़की ?

हेल्थ डेस्क- गर्भ में लिंग का निर्माण के संबंध में प्राचीन आचार्य तथा आधुनिक चिकित्सा विद्वानों ने पर्याप्त विवेचना प्रस्तुत की है. वीर्य एवं शोणित के संयोग ( Fertilization ) से उनकी स्थिति के अनुसार लिंग की उत्पत्ति होती है. इस सिद्धांत में प्राचीन तथा आधुनिक विद्वानों में समान रूप से पुष्टि मिली है. इस संबंध में प्राचीन आचार्यों ने विस्तृत रूप से सिद्धांत को दर्शाया है जिसका पूर्ण समर्थन आधुनिक विद्वानों ने किया है.

गर्भ में लिंग का निर्माण कैसे होता है ? कैसे जाने लड़का है या लड़की ?

चिकित्सा विद्वानों के द्वारा शुक्राणु तथा डिंब के मिलने से क्रोमोसोम की संख्या 48 बताई गई है. पर्याप्त अनुसंधान के पश्चात यह भी ज्ञात हुआ है कि इन क्रोमोसोम्स में कुछ लिंग वाहक क्रोमोसोम्स भी होते हैं. स्त्री बीज में इनकी संख्या 2 आंकी जा सकती है. जिसके विभाजन के द्वारा प्रत्येक पक्व स्त्री बीज में स्त्री बीजवाहक क्रोमोसोम्स आ जाता है. शुक्राणु में पुरुष जनक क्रोमोसोम्स एक होता है जिसका विभाजन नहीं होता है. इस प्रकार विभाजन के समय वीर्य में आधे शुक्राणु पुरुषजनक होते हैं. इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि वीर्य में आधे शुक्राणु बलवान होते हैं जो स्त्री बीज के साथ मिलने पर उत्पन्न होने वाले गर्भ में पुंसत्व उत्पन्न कर सकते हैं. आधे वीर्य निर्बल होते हैं जो स्त्री बीज के साथ मिलने पर गर्भ में पुंसत्व पैदा नहीं कर पाते हैं. ऐसी स्थिति में स्त्री वीर्य बलवान हो जाता है जिससे गर्भ स्त्रीलिंगी ( लड़की ) होती है.

कुछ विद्वान केवल शुक्राणु की कार्य क्षमता को ही विशेष महत्व नहीं देते हैं. उनके मतानुसार प्रत्येक स्त्रीबीज में भी दो लिंगवाहक क्रोमोसोम्स होते हैं जो स्त्रीत्ववाहक ( x ) होते हैं और वीर्य में एक ही लिंगवाहक क्रोमोसोम्स होता है. स्त्रीबीज के साथ स्त्रीवाहक क्रोमोसोम्स से पुरुष बीज का संसर्ग होने से ऐसे क्रोमोसोम्स की संख्या दुगनी हो जाती है इस प्रकार से उत्पन्न गर्भ स्त्रीलिंगी यानी गर्भ में लड़की होती है.

इसके विपरीत यदि स्त्री बीज के साथ पुरुषवाहक क्रोमोसोम ( Y )शुक्राणु का मिलन होता है तो पुरुषजनक क्रोमोसोम्स बलवान होता है जिससे गर्भ पुरुषलिंगी यानी गर्भ में लड़का होता है.

कुछ विद्वानों का कहना है कि शुक्राणु में क्रोमोसोम की संख्या 47 होती है. जब यह विभाजन के द्वारा वीर्य में आते हैं तो आधे क्रोमोसोम्स 24 की संख्या से युक्त और आधे 23 की संख्या से युक्त होते हैं. जब 24 क्रोमोसोम्स का संसर्ग स्त्रीबीज से होता है तब पुरुष जन्य क्रोमोसोम्स के बलवान होने के कारण स्थापित गर्भ पुरुषलिंगी यानी लड़का होता है और जब 23 पुरुष क्रोमोसोम्स का संयोग स्त्रीबीज से होता है तब स्त्री क्रोमोसोम्स के बलवान होने के कारण स्थापित गर्भ स्त्रीलिंगी यानी गर्भ में लड़की होती है.

अन्य विद्वानों के अनुसार-

फ़र्टिलाइज़र स्त्रीबीज से भ्रूण के विकास के उपरांत संतान का लिंग फर्टिलाइजेशन के समय ही निश्चित हो जाता है. मनुष्य के सोमेटिक और बॉडी सेल्स में 46 क्रोमोसोम्स होते हैं अर्थात 23 समजात क्रोमोसोम जुड़े होते हैं. प्रत्येक समजात जोड़े के दोनों साथी हर प्रकार के समान होते हैं, लेकिन पुरुष में केवल एक जोड़े की दोनों साथी समान नहीं होते हैं इस प्रकार पुरुष में 22 समजात जोड़े समान साथियों वाले और एक जोड़ा असामान साथियों वाला होता है. पहले प्रकार के जोड़ों को ऑटोसोम्स तथा दूसरे वाले को हेट्रोसोम्स अथवा लिंग क्रोमोसोम कहते हैं. अब यदि समान क्रोमोसोम्स को X से अंकित किया और असामान को Y से तो लिंग क्रोमोसोम के जोड़े को XY और अन्य जोड़ों को XX से अंकित करना होगा. इससे यह भी स्पष्ट है कि स्त्री में केवल XX जोड़े ही होती हैं.

जिस समय टेस्टीज में शुक्राणु उत्पन्न होंगे अर्थात अर्धसूत्री विभाजन तथा समजात जोड़ों में पृथक्करण होगा तो XY समजात जोड़ों से दो प्रकार के शुक्राणु बनेंगे. एक में X और दूसरे में Y क्रोमोसोम्स होंगे. इस प्रकार स्त्री में जो ओवम बनेंगे उन सभी में X क्रोमोसोम्स होंगे अर्थात यह एक प्रकार के होंगे. फर्टिलाइजेशन के समय यदि X क्रोमोसोम वाला शुक्राणु स्त्री बीज से मिलेगा तो XX जाईगोट बनेगा और कन्या ( लड़की ) को जन्म देगा. इसके विपरीत Y क्रोमोसोम वाले शुक्राणु द्वारा फर्टिलाइजेशन से XY जाईगोट अर्थात पुत्र ( लड़का ) का जन्म होगा. जैसा की आगे के चित्र से स्पष्ट हो रहा है.

गर्भ में लिंग का निर्माण कैसे होता है ? कैसे जाने लड़का है या लड़की ?

इसी प्रकार एक अन्य वर्ग के वैज्ञानिकों का कहना है कि स्त्री बीजों में स्वभावतः स्त्री जनक तथा पुरुष जनक क्रोमोसोम्स दोनों ही मौजूद रहते हैं. जब स्त्री जनक क्रोमोसोम्स से गर्भ की उत्पत्ति होती है तब गर्भ में कन्या ( लड़की ) उत्पन्न होती है. जब पुरुष जनक क्रोमोसोम्स पर गर्भ स्थापित होता है तब पुत्र ( लड़का ) उत्पन्न होता है.

वैज्ञानिकों ने परीक्षण से ज्ञात किया है कि दाहिने बीजकोष से उत्पन्न बीज से पुरुष संतान की उत्पत्ति होती है और बायाँ बीज कोष से उत्पन्न बीज के द्वारा कन्या ( लड़की ) उत्पन्न होती है. साथ ही यह भी बताया है कि प्रत्येक मास में अलग-अलग डिम्बकोष से डिम्ब की उत्पत्ति होती है. जब एक महीना में दायाँ बीज कोष से डिम्ब की उत्पत्ति होती है तब दूसरे माह में बायाँ डिम्बकोष से पक्व डिम्ब की उत्पत्ति होती है. बायाँ डिम्बकोष से उत्पन्न डिम्ब मजबूत तथा दायाँ डिम्बकोष से उत्पन्न होने वाला डिम्ब कमजोर होता है. यदि दैवयोग से बायाँ डिम्बकोष वाले से शुक्राणुओं का संयोग हो जाता है तो गर्भस्थ लिंग कन्या ( लड़की ) होती है अन्यथा पुत्र ( लड़का ) होता है.

कन्या एवं पुत्र प्राप्ति हेतु अन्य मत-

1 .शारीरिक स्वास्थ्य एवं आहार-

लिंग उत्पत्ति में शुक्र की अधिकता एवं आर्तव की अल्पता का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है. शुक्रवीर्य की अधिकता से पुत्र की प्राप्ति होती है और आर्तव की अधिकता से कन्या की प्राप्ति होती है. ऐसा वैज्ञानिकों का विचार है. पुराने आचार्यों ने तो इसका दृढ़ता के साथ समर्थन किया है. इससे यह सिद्ध होता है कि पुरुष के स्वस्थ होने पर वीर्य की अधिकता होती है जिससे पुरुष लिंग अर्थात पुत्र की उत्पत्ति होती है. इसके विपरीत स्त्री का कृश होना अति आवश्यक है. पुरुष के स्वस्थ रहने के लिए उचित पौष्टिक भोजन की पर्याप्त जरूरत होती है. इसके विपरीत स्त्री को कृशकारक भोजन देना आवश्यक होता है.

जब पुरुष अति दयनीय स्वास्थ्य का होता है तब स्त्री अति हृष्ट- पुष्ट एवं शक्तिशाली होती है तब आर्तव की अधिकता की कन्या की प्राप्ति होती है.

2 .शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य तथा अपत्योत्पादन की इच्छा इत्यादि में यदि पुरुष स्त्री से प्रबल होता है तब पुत्र ( लड़का )उत्पन्न होता है. इसके विपरीत स्त्री की इच्छा प्रबल होने पर कन्या ( लड़की ) पैदा होती है.

3 .पुरुष का ब्रह्मचर्य- प्राचीन आचार्यों का कहना है कि ज्यादा स्त्री प्रसंग करने से कन्या ही पैदा होती है. जैसा कि वेश्याओं में देखने को मिलता है जो व्यक्ति पर्याप्त समय तक ब्रह्मचर्य रहकर स्त्री समागम करता है और उसके अनंतर जो संतान पैदा होता है वह पुत्र ही होता है. अधिक संयम से पुरुष में आकर्षण भी बढ़ता है जिससे स्त्री प्रसंग में आनंद आता है और इच्छाएं प्रबल होती है. पुरुष की इच्छाएं प्रबल होने से पुरुष संतान ( लड़का ) ही पैदा होता है.

यानी विद्वानों का कहना है कि जो व्यक्ति जितना ही अधिक स्त्री प्रसंग करते हैं उन्हें उतनी ही अधिक कन्या लड़की संतान पैदा होती है.

4 .शारीरिक संबंध का समय-

इच्छानुसार संतान पैदा करने के लिए शारीरिक संबंध के विषय में आयुर्वेद के महत्वपूर्ण ग्रंथों में विशद विवेचन देखने को मिलता है. मासिक स्राव बंद होने के बाद 5वें दिन से 8 से 12 दिन तक गर्भधारण का उपयुक्त समय माना गया है. इसमें समदिन यानी 6, 8, 10, 12, 14वें रात्रि में शारीरिक संबंध पुत्र के लिए और विषम दिन यानी 7, 9, 11, 13वें रात्रि में कन्या के लिए योग्य माने गए हैं अर्थात समरात्री में शारीरिक संबंध बनाने से पुत्र ( लड़का ) उत्पन्न होता है और विषम रातों में शारीरिक संबंध बनाने से कन्या ( लड़की ) उत्पन्न होती है.

शीगल नामक आधुनिक वैज्ञानिक ने अपने अनुभव से प्रस्तुत किया है कि पहले 9 दिनों में शारीरिक संबंध बनाने से यदि गर्भ धारण हो जाता है तब पुत्र ( लड़का ) का जन्म होता है. 10 से 14 दिन में गर्भधारण होने पर पुत्र एवं कन्या बराबर पैदा होते हैं. इसके पश्चात 23 दिन तक केवल कन्याएं ही पैदा होती है. इसके बाद के दिनों में गर्भधारण नहीं होता है यदि होता भी है तो केवल पुत्र ही पैदा होता है.

प्रारंभ के 10-12 दिनों में पुत्र होने की अधिक संभावना रहती है. इसका समर्थन अधिकांश विद्वान करते हैं.

प्रायः परिपक्व डिम्ब  डिम्ब ग्रंथि से 12वें दिन बाहर आता है और पुरुष वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं के सहयोग से गर्भ की उत्पत्ति होती है. यदि 12वें दिन से पूर्व ही शारीरिक संबंध हो जाती है तो यह परिपक्व डिम्ब अपने निश्चित काल से पहले ही बाहर निकल आता है इस अवस्था में वह डिम्ब अपरिपक्व होता है साथ ही अल्प बल वाला होता है. इस समय अल्प बल की अवस्था में पुरुष वीर्य शुक्राणु से संयोग होने पर प्रायः पुत्र की प्राप्ति होती है. जब यह ओवम अपने निश्चित समय पर परिपक्व अवस्था में निकलता है तब बल की अधिकता के कारण गर्भाधान की संतान प्रायः कन्या ही होती है. जब महीने के अंतिम दिनों में शारीरिक संबंध होता है तब अतिपक्व होने के कारण दुर्बल होता है जिससे पुत्र ही उत्पन्न होता है अथवा इन दिनों में वीर्य के नष्ट होने के कारण गर्भधारण ही नहीं होता है.

यदि शारीरिक संबंध के दौरान पुरुष का वीर्य पहले उत्सर्जित हो जाता है तो पुत्र पैदा होता है. यदि शारीरिक संबंध के समय स्त्री का बीज पहले उत्सर्जित होता है और पुरुष वीर्य का उत्सर्जन बाद में होता है तब बीज परिपक्वता से कन्या उत्पन्न होती है.

5 .अपत्य मार्ग की अवस्था के अनुसार लिंग की उत्पत्ति-

पुरुष वीर्य में निर्बल तथा सबल दो प्रकार के शुक्राणु होते हैं. इसमें निर्बल शुक्राणुओं के सहयोग से कन्या और सबल शुक्राणुओं के सहयोग से पुत्र की उत्पत्ति होती है. विद्वानों के अनुसार Y क्रोमोसोम से शुक्राणु X क्रोमोसोम्स की अपेक्षा अधिक सबल, चपल एवं कठिनाइयों के साथ सफलता से सामना करने वाला होता है. इस प्रकार यदि अपत्य मार्ग गर्भाशय द्वार के निकट वीर्यपात होने की अपेक्षा योनि द्वार के पास हो और क्षारीय प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप शक्राणु के लिए व्यवधान हो जाए तो उक्त Y क्रोमोसोम ही भीतर पहुंचने में समर्थ होता है जिसके अनंतर गर्भधारण होने पर पुत्र पैदा होता है.

शारंगधर के अनुसार उपर्युक्त सभी सिद्धांत अनुपयुक्त प्रतीत होते हैं. उनके विचार से गर्भ में लिंग की उत्पत्ति दैवयोग से होती है. इसका कोई भी स्थिर एवं निश्चित प्रमाण नहीं है. जिससे लिंग की उत्पत्ति का आधार सुनिश्चित किया जा सके. पुत्र एवं कन्या की उत्पत्ति केवल ईश्वर की इच्छा पर ही आधारित है.

अन्य साधारण विचार-

डॉक्टर सिक्स्ट का विचार है कि पुरुष के दाहिने अंड से निकले हुए वीर्य का स्त्री के दाएं डिम्बकोष से निकले डिम्ब के साथ संयोग होने से पुत्र एवं पुरुष के बाएं अंड से निकले हुए स्त्री के बाएं डिम्बकोष से निकले हुए डिम्ब के साथ संयोग होने से कन्या उत्पन्न होती है. इस सिद्धांत की पुष्टि डॉक्टर रूलमेन के अनुसार हो जाती है. उनकी चिकित्सा में एक ऐसा व्यक्ति था जिसके बाएं एंड में चोट थी उसकी उत्पन्न सभी संताने पुत्र ही थे. अतीत में जब उसकी परीक्षा की गई तो पता चला कि उसका बाया अंड चोट से बेकार हो गया है.

रति शास्त्र में लिखा है कि पुरुष के दाहिने और स्त्री के बाएं अंड से निकला वीर्य प्रबल ( मजबूत ) होता है.

पुत्र उत्पन्न करने के लिए दोनों के दाहिनी नाक से श्वास निकलनी चाहिए. इससे महिला पुरुष दोनों का दाहिना अंड ऊपर को चढ़ जाता है और इसी डिम्ब से वीर्य निकल कर पुरुष के दाहिने अंग का वीर्य स्त्री के दाहिने अंग के डिम्ब से मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है. कन्या उत्पन्न करने के लिए इसके विपरीत स्त्री पुरुषों को बाई नाक से सांस लेनी चाहिए.

पर्याप्त अध्ययन के पश्चात एक विचार और सामने आया है वह यह है कि एक बार कन्या उत्पन्न होने के पश्चात कुछ केसों में बार-बार कन्याएं ही उत्पन्न होती है अथवा एक बार पुत्र उत्पन्न होने के बाद बार-बार पुत्र ही उत्पन्न होती हैं. इसका कारण यह है कि मान लिया एक बार बाई और की जननेंद्रिय में गर्भ स्थापित होकर कन्या की उत्पत्ति होती है तो उस स्थान की जननेंद्रिय में एक गड्ढा सा बन जाता है और गड्ढा पूर्ण होने के पहले ही पुनः गर्भ स्थापना हो जाती है तो कन्या ही पैदा होती है. इसमें होता यह है कि पुरुष वीर्य निकलने के पश्चात वीर्य से निकला प्रबल स्पर्म उसी गड्ढे में फिसल जाता है और ऊपर से आए हुए ओवम के साथ संयोग कर पुनः स्त्रीलिंगी गर्भ स्थापना करता है जिससे बार-बार कन्याएं ही पैदा होती है. यदि इसके विपरीत हो तो बार-बार पुत्र की उत्पत्ति होती है.

ऐसा होना तभी संभव है जब कि गर्भ स्थापना एक के बाद एक थोड़े ही अंतर से होती रहे, इस सिद्धांत में कई अपवाद सामने आते हैं इसलिए यह विचारधारा सही प्रतीत नहीं होती है.

कैसे जाने गर्भ में लड़का है या लड़की-

गर्भ में लड़का है या लड़की इस संबंध में पर्याप्त अनुसंधान हो चुके हैं. इनका पता अब आसानी से 3 माह के बाद लगाया जा सकता है. काफी दिन पहले शिकागो के डॉक्टर गस्टेव डब्ल्यू रेप तथा डॉक्टर गारवूड सी रिचर्डसन ने 6 माह की गर्भवती महिलाओं के लिंग का पता उनकी लार की परीक्षा से लगाया था कि इस महिला के गर्भ में पुत्र है अथवा पुत्री. वह इसमें पूर्ण सफल भी हुए थे. उनके परीक्षण में जिन गर्भवती महिलाओं की लार पॉजिटिव निकली थी उनमें अधिकांश को लड़का पैदा हुआ था और जिनकी लार नेगेटिव थी उनको लड़की पैदा हुई थी.

अब नवीन उपकरणों द्वारा 3 माह के गर्भ में यह पता लगाया जा सकता है कि गर्भस्थ शिशु लड़का है अथवा लड़की. गर्भाशय के गर्भ का एक साधारण टिशू लेकर इसका परीक्षण किया जाता है. यह परीक्षण शत प्रतिशत सही निकलता है. ऐसा परीक्षण ऑल इंडिया मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट नई दिल्ली में किया जाता है. जहां यह सुविधा उपलब्ध है.

आचार्य वाग्भट के अनुसार-

स्त्री की सब चेष्टाएँ, सब क्रियाएं यदि बाएं अंग से अधिक प्रकट हो. बाई पसली की तरफ गर्भ का संचय अधिक हो. बाएं स्तन से दूध पहले निकले तो गर्भ से कन्या की उत्पत्ति समझनी चाहिए.

पहले दाहिने स्तन में दूध आवे, पहले दाहिने अंग से चले, काम में दाहिने हाथ को ही आगे बढ़ावे, पुरुष नाम वाली बच्चों की अधिक इच्छा प्रकट करने और दाहिनी कुक्षी के ऊंची होने से गर्भ में पुत्र की उत्पत्ति समझनी चाहिए. प्रायः परिश्रमी महिलाओं को पुत्र और नाजुक तथा ढीली- ढाली महिलाओं को लड़कियां पैदा होती है. इसमें पर्याप्त अपराध होने से यह विचारधारा सही प्रतीत नहीं होती है.

डॉ जांस्टन का विचार-

यदि भ्रूण के हृदय का स्पंदन 130 बार प्रति मिनट से अधिक हो तो गर्भस्थ शिशु को कन्या ( लड़की ) समझें. यदि गर्भ के हृदय का स्पंदन 130 से कम हो तो पुत्र ( लड़का ) समझें.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है. अधिक जानकारी के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह लें. धन्यवाद.

लेख स्रोत- स्त्री रोग चिकित्सा.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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