माँ और बच्चे को स्तनपान कराने के अनमोल फायदे, जाने कब नही कराना चाहिए

हेल्थ डेस्क- स्तनपान के बारे में कुछ माँओं को मन में कई प्रकार के संदेह उत्पन्न हो सकती है. जैसे बीमारी आदि की अवस्था में बच्चे को दूध पिलाना चाहिए या नहीं या कई माँओं को स्तन की बनावट को लेकर शंका और स्तन की सुंदरता को लेकर शंका भी कई महिलाओं को बनी रहती है. हालांकि किसी भी स्थिति में स्तनपान कराना उत्तम ही होता है इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता है.

माँ और बच्चे को स्तनपान कराने के अनमोल फायदे, जाने कब नही कराना चाहिए

चलिए जानते हैं विस्तार से-

स्तनपान प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार है, जहां शिशु को पहले आहार के रूप में सर्वश्रेष्ठ आहार प्राप्त होता है. वही मां और बच्चे में भावनात्मक रिश्ता बनता है. इससे बच्चे और मां दोनों को ही अमूल्य संतुष्टि हासिल होती है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार 6 महीने तक शिशु को स्तनपान कराना चाहिए. इसके बाद 2 साल की उम्र तक अन्य आहार के साथ स्तनपान कराना चाहिए.

स्तनपान कराने के फायदे क्या हैं?

1 .प्राकृतिक सबसे उत्तम आहार-

मां का दूध नवजात शिशु के कोमल अंगों तथा पाचन क्रिया के प्रकृति द्वारा बना होता है. इसमें बच्चे की जरूरत के सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में मौजूद होते हैं, जिसे आसानी से शिशु पचा लेता है. मां के दूध में मौजूद प्रोटीन और वसा गाय के दूध की तुलना में अधिक आसानी से पच जाता है. इससे शिशु के पेट में गैस बनने, कब्ज होने, दस्त आदि होने की संभावना बहुत कम रहती है.

इतना ही नहीं मां का दूध नुकसान करने वाले माइक्रो ऑर्गनिज्म को नष्ट कर के आँतों में लाभदायक तत्वों की बढ़ोतरी भी करता है.

2 .जरूरत के अनुसार बदलाव-

मां के दूध में शिशु की जरूरत के अनुसार से परिवर्तन होते रहते हैं. दिन में, रात में, कुछ सप्ताह में और कुछ महीनों में शिशु को पोषक तत्वों की जरूरत बदल जाती है उसी के अनुसार मां के दूध में भी बदलाव अपने आप हो जाते हैं ऐसा प्राकृतिक देन है.

3 .नहीं होती है एलर्जी-

स्तनपान करने की एलर्जी नहीं होती है. खान-पान में बदलाव के अनुसार मां के दूध के साथ स्वाद या गंध में बदलाव हो सकता है लेकिन यह एलर्जी का कारण या नुकसान का कारण नहीं बन सकता है जबकि अन्य प्रकार के दूध या आहार से शिशु एलर्जी का शिकार हो सकता है.

4 .रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है मजबूत-

नियमित स्तनपान करने वाले बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है. मां का दूध में सर्दी, जुकाम, खांसी या अन्य संक्रमण से बचाने में मददगार होता है. अन्य प्रकार की बीमारी की संभावना भी स्तनपान करने वाले शिशुओं को कम होती है.

5 .नहीं बढ़ती है अनावश्यक चर्बी-

स्तनपान करने वाले शिशु के शरीर पर अनावश्यक चर्बी नहीं बढ़ती है, जिससे मोटापा के शिकार होने का भी खतरा नहीं रहता है. मां के दूध से पेट भरते ही तृप्ति मिल जाने के कारण शिशु आवश्यकता से अधिक दूध नहीं पीता है जबकि बोतल आदि से दूध पीने की जरूरत से ज्यादा दूध की जाता है जो मोटापे का कारण बन जाता है. बड़े होने के बाद भी बचपन में मिला स्तनपान मोटापे तथा कोलेस्ट्रोल आदि से बचाव करता है.

6 .दिमाग होता है तेज-

बच्चे को स्तनपान से मिलने वाले दूध से डी एच ए प्राप्त होता है जो दिमाग को तेज बनाने का काम करता है. स्तनपान की प्रक्रिया भी शिशु को मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाने में सहायक होती है. इससे शिशु को भावनात्मक सुरक्षा का एहसास मिलता है जो मस्तिष्क के उचित विकास में सहायक होता है.

7 .मुंह और दांत का विकास-

शिशु का मुंह स्तन से दूध पीने के लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है. स्तनपान की प्रक्रिया के बच्चे का सही तरीके से विकसित होता है तथा दांत निकलने में भी यह प्रक्रिया मददगार होती है. इससे बच्चे के जबड़े भी मजबूत बनते हैं.

8 .ज्यादा सुविधाजनक-

जब भी बच्चे को भूख लगे तो स्तनपान कराने के लिए किसी प्रकार की कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती है. घर से बाहर जाने पर भी शिशु का आहार हमेशा मां के साथ होता है, जबकि अन्य प्रकार की दूध या आहार के लिए गर्म, ठंडा, सफाई इत्यादि का बहुत ख्याल रखना पड़ता है.

9 .मां के लिए भी होता है लाभदायक-

स्तनपान कराने से मां के गर्भाशय को अपने उचित आकार में आने में मदद मिलती है. यह रक्त स्राव में काफी कमी लाता है. माहवारी शुरू होने की प्रक्रिया देर से शुरू होने मददगार होता है. स्तनपान वापस जल्दी गर्भधारण होने की संभावना को भी कम करता है.

10 .गंभीर बीमारियों से करता है बचाव-

स्तनपान कराने से मां को गर्भाशय, ओवरी तथा स्तन के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के होने का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है.

11 .मां को मिलता है आराम-

शिशु को जन्म देने के बाद मां के शरीर को आराम की सख्त जरूरत होती है. स्तनपान कराते समय सब काम छोड़ कर बैठना पड़ता है इससे मां के शरीर को आराम मिल जाता है.

12 .डिप्रेशन से रखता है दूर-

प्रसव के बाद कभी-कभी मां को डिप्रेशन की समस्या होने लगती है जिसे पोस्ट नेटल डिप्रेशन कहा जाता है. स्तनपान इस प्रकार के डिप्रेशन को दूर करने में अहम भूमिका निभाता है. स्तनपान कराने से मां के मन को भी संतुष्टि मिलती है.

कब नहीं कराना चाहिए स्तनपान ?

गंभीर बीमारियों में-

यदि मां को कोई गंभीर बीमारी जैसे संक्रमण, टीबी, एड्स आदि हो तो दूध के माध्यम से शिशु को भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में स्तनपान नहीं कराना चाहिए. साधारण बुखार आदि की स्थिति बिना संकोच किए स्तनपान कराया जा सकता है. हालांकि आपको इस बारे में चिकित्सक की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए.

दवा सेवन करने की स्थिति में-

किसी दवा को लेने के बाद दूध पर असर पड़ता है. दवा दूध के माध्यम से शिशु के शरीर में जाकर उसे नुकसान पहुंचा सकती है. अतः दवा के असर के बारे में डॉक्टर सलाह जरूर ले लेनी चाहिए.

नशा-

कई महिलाएं नशा करने के आदी होते हैं. मां द्वारा सेवन किया गया किसी भी प्रकार का नशा दूध के माध्यम से शिशु के शरीर में पहुंचकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए ऐसी अवस्था में स्तनपान नहीं कराना चाहिए.

हानिकारक धुंआ वाली जगह या फैक्ट्री-

इस प्रकार के वातावरण के कारण माँ के दूध पर प्रभाव पड़ सकता है. अतः इसके प्रति सावधान रहना आवश्यक है.

नोट- यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से लिखा गया है अधिक जानकारी के लिए आप अपने डॉक्टर की सलाह लें. धन्यवाद.

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मैं आयुर्वेद चिकित्सक हूँ और जड़ी-बूटियों (आयुर्वेद) रस, भस्मों द्वारा लकवा, सायटिका, गठिया, खूनी एवं वादी बवासीर, चर्म रोग, गुप्त रोग आदि रोगों का इलाज करता हूँ।

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